Saturday, November 27, 2010

क्या बदल गया बिहार?


हिटलशाही के दौर में एक कहावत बहुत मशहूर हुई थी. एक झूठ को सौ बार बोलो, वो सच हो जाएगा. और बकायदा झूठ को प्रचारित करने के लिए हिटलर ने एक मंत्री की भी नियुक्ति की थी. ताजा उदाहरण बिहार सरकार है. विकास और सुशासन की छवि, जो यहां बनी नहीं बनाई गई है, उसमें भी इसी फॅर्मूले का इस्तेमाल किया गया है. यानि, जितना विकास हुआ नहीं उससे कहीं ज्यादा इसके बारे में लोगों को बताया जा रहा है. और,बार-बार बताया जा रहा है. जाहिर है, इसके लिए मीडिया का सहारा लिया गया और जम कर विज्ञापन बांटे गए. सूबे के मुख्यमंत्री नीतीशकुमार के चार साल के कार्यकाल में करीब 65 करोड रूपये से भी ज्यादा के विज्ञापन विभिन्न अखबारों और न्यूज चैनलों को बांटे गए. जाहिर है, बुलबुल भी वैसी ही नाचेगी जैसे पैसा देने वाला चाहता है. हुआ भी ऐसा ही. करोडों का विज्ञापन लेने के बाद मीडिया ने भी बिहार की ऐसी छवि बनाई मानो सचमुच बिहार अब भूखमुक्त,भयमुक्त, भ्रष्टाचरमुक्त हो गया है.मीडिया ने नीतीश कुमार की जितनी बड़ी छवि गढ़ी है, बिहार की जनता ने उससे कई गुना बड़ा जनादेश उनको दिया है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बिहार विधानसभा में अब तकनीकी तौर पर विपक्ष वजूद ही समाप्‍त हो गया है। मुख्‍य विरोधी दल का दर्जा पाने के लिए किसी एक दल के खाते में कुल सीटों का दस प्रतिशत सीट होना चाहिए। लेकिन चुनावी नतीजे बता रहे हैं कि राजद-लोजपा 25 सीटों पर ही निपट गये। प्रथम मुख्‍यमंत्री श्रीकृष्‍ण सिंह और राबड़ी देवी के बाद नीतीश कुमार पहले मुख्‍यमंत्री है, जिन्हें लगातार दूसरी बार बिहार का मुख्‍यमंत्री बनने का अवसर मिला है। इस भारी जीत की चुनौतियां कितनी भारी हैं, इसे नीतीश कुमार से अधिक और कौन समझ सकता है। यही वजह है कि नतीजे आने के तुरंत बाद नीतीश कुमार जब मीडिया से मुखातिब हुए, तो चुनौतियों के बोझ तले दबे दिखे। उन्होंने कहा, मैं काम करने में भरोसा रखता हूं। मेरे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। मैं दिन-रात मेहनत करूंगा। बिहार के लोगों ने मुझमें जो विश्वास जताया है, वही मेरी पूंजी हैं। अब बात बनाने का समय नहीं है। काम करने का समय है

दरअसल, नीतीश सरकार ने मीडिया की कमजोरी को पहचान लिया था . और, यह कमजोरी है, विज्ञापन की. अफरोज आलम ने बिहार सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग से आरटीआई के तहत राज्य सरकार द्वारा जारी की गई विज्ञापन के बारे में सूचनाएं मांगी थी. प्राप्त सूचना से पता चलता है कि सरकार का काम पर कम, विज्ञापन करने पर ज़्यादा ध्यान रहा है. सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की ओर से साल 2005 से 2010 के बीच(नीतीश कुमार के कार्यकाल के चार सालों में) लगभग 64.48 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए. जबकि लालू-राबड़ी सरकार के कार्यकाल के अंतिम 6 सालों में महज 23.90करोड़ ही खर्च हुए थे. मिली सूचना के मुताबिक सूचना एवं जन-सम्पर्क विभाग ने साल 2009-10 में (28 फरवरी 2010 तक)19,66,11,694 (लगभग 20 करोड) रूपये का विज्ञापन जारी किया है,जिसमें से 18,28,22,183 (लगभग 18 करोड से ज्यादा) रूपये का विज्ञापन प्रिन्ट मीडिया को और 1,37,89,511(लगभग डेढ करोड) रूपये का विज्ञापन इलेक्ट्रॅानिक मीडिया को दिया गया. इतना ही नहीं,नीतीश सरकार के चार वर्ष पूरे होने पर एक ही दिन1,15,44,045(लगभग 1 करोड से ज्यादा) रूपये का विज्ञापन एक साथ 24 समाचार पत्रों को जारी किया गया. इसमें भी सबसे ज्यादा एक खास समूह के अखबार को दिया गया. कुछ खास अखबारों को तो अकेले 50 लाख रूपये से ज्यादा का विज्ञापन दिया गया है.

अब ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार की असली तस्वीर और विकास की कमजोर चारदीवारी के पीछे का सच दिखा पाना ऐसे अखबारों के लिए कितना मुश्किल है. क्योंकि जब आप सच दिखाएंगे या छापेंगे तो विज्ञापन कैसे मिलेगा? और ऊपर से तुर्रा ये की बिहार में विजय की पताका फेहराने वाले नीतीश कुमार ने स्वयं को निमित्त मात्र बता कर सारी ताकत जनता को कह दिया हैं। बिहार में इतिहास बनाकर नीतीश कुमार ने देश को संदेश तो दे दिया है कि काम के आगे सारे समीकरण बेकार हैं? पर क्या कोई काम हुआ भी है. या मात्र हवाई किले ही बनाये गए हैं. प्रधान मंत्री ग्राम योजना के तहत बनायीं गयी सड़कें हो या राजीव गाँधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना से आई बिजली. सब कुछ तो केंद्र का है और केंद्र की एजेंसियों से कराया हुआ. उसमें भी जितना जनता तक पहुँचाना था वो पंहुंचा ही नहीं. "यानी बन्दर के हाथ लगी अदरक की गाँठ और बन बैठा पंसारी" . वास्तविकता में बिहार की 52 फीसदी आबादी आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करती है। बिहार की प्रति व्‍यक्‍ित आय 13 हजार रुपये सालाना है, जो देश की प्रति व्‍यक्ति आय 41 हजार रुपये सालाना से बहुत पीछे है। बिजली की भारी किल्‍लत के कारण इस राज्‍य में कल-कारखाने पनप नहीं पा रहे हैं और उद्योग-धंधे के नाम पर किसी प्रकार का निवेश नहीं है. तो फिर कौन सा विकास और काहे का. सब हवा हवाई है.

बहुत दिन नहीं हुए उस बात को जब मात्र एक छोटी सी घटना पर नितीश जी इतने नाराज हुए की उन्होंने गुजरात सरकार की पांच करोड़ रूपए की सहायता वापिस कर डाली पर ऐसा करते हुए वे अपने समाजवादी गुरु किशन पटनायक को भूल गए जिनकी अगुवाई में उन्होंने उस समाजवाद की शिक्षा ली थी जो भारतीयता से ओतप्रोत थी. जिसमें भारत के हर कोने का नागरिक एक समान था और डॉक्टर लोहिया से लेकर जयप्रकाश नारायण रहे हों या फिर किशन पटनायक, सबका मानना था कि पूरे देश के नागरिक को देश के हर इलाके में आने-जाने और रहने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उनकी इस सोच का मतलब साफ था कि इससे भारतीय गणराज्य का नागरिक सही मायने में पूरे भारत को अपना मान सकेगा और क्षेत्रीयता की धारणा से उपर उठ सकेगा। पर गुजरात के नागरिकों के स्नेह से सना पैसा उन्होंने मात्र इसलिए लौटा दिया ताकि बिहार के १२% अल्पसंख्यक वोटों को अपनी ओर खींचा जा सके. और ऐसी ही कितनी कलाबाजियां उन्होंने दिखाई हैं.

नितीश जी को ये भी ध्यान से देखना होगा की २००५ का चुनाव उन्होंने अगर लालूराज के खिलाफ गोलबंद वोटों के दम पर जीता था तो उनके सहयोगी दल के साथ उनके दोयम व्यवहार के बावजूद उसी दल ने ११० में से करीब ९१-९२ सीटें जीत कर अपनी ताकत दिखा दी है. और इस बार भी जनता के उसी दर का इस्तेमाल किया फिर से नितीश जी ने ये कहते हुए की अगर कांग्रेस को वोट देंगे तो वह फिर से लालू को जाएगा क्योंकि वे UPA के घटक हैं और दिखावे की राजनीति कर रहे हैं. फिर अपना पुराना दांव सफलता पूर्वक चलकर नितीश जी ने छद्म करिश्मे की सूरत गढ़ते हुए अपने पुराने गुरुभाई लालू जी की तरह जनता को बेवक़ूफ़ बनाने की कला में माहिर हो गए हैं.


एक और चीज इस चुनाव में सामने दिखी. जनता से अपने काम की मजूरी मांगते नितीश कुमार के अधिकाँश सहयोगी या तो करोडपति हैं या बाहुबली. अब ये कौन बताये की आम बिहारी की गरीबी को ये कैसे दूर करेंगे जिनकी जिम्मेदार वे खुद ही हैं. .ध्यान देने योग्य बात यह भी है की इन चुनावों में राजग को मात्र ४१-४२ % जनता का वोट मिला है लेकिन इसी अल्पमत के बल पर उसने तीन चौथाई सीटें जीत ली हैं.यह शुरू से ही हमारे लोकतंत्र की बिडम्बना रही है कि देश में हमेशा अल्पमत क़ी सरकार बांटी रही है.देखना है कि सरकार जनता को किए गए वादों में से कितने को पूरा कर पाती है.प्रचार अभियान के दौरान राजग ने बिजली,रोजगार सृजन और भ्रष्टाचार सम्बन्धी नए कानून के क्रियान्वयन का वादा किया था.डगर आसान नहीं है.खासकर भ्रष्टाचार ने जिस तरह से शासन-प्रशासन के रग-रग में अपनी पैठ बना ली है.उससे ऐसा नहीं लगता कि नीतीश भ्रष्टाचारियों खासकर बड़ी मछलियों की संपत्ति पर आसानी से सरकारी कब्ज़ा कर उसमें स्कूल खोल पाएँगे जैसा कि उन्होंने अपने भाषणों में वादा किया था.पिछली बार से कहीं ज्यादा आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग राजग की तरफ से जीत कर विधानसभा में पहुंचे हैं.इन पर नियंत्रण रखना और इन पर मुकदमा चलाकर इन्हें सजा दिलवाना भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती रहेगी.अगले साल बिहार में पंचायत चुनाव होनेवाले हैं.राजग सरकार इसे दलीय आधार पर करवाना चाहती है.अगर ऐसा हुआ तो निश्चित रूप से इन चुनावों में भी राजग जीतेगा और सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाएगी.राज्य में पंचायत स्तर पर और जन वितरण प्रणाली में जो व्यापक भ्रष्टाचार है वह किसी से भी छुपा हुआ नहीं है.हालांकि गांवों में शिक्षामित्रों की बहाली कर दी गई है लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता में विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक में अभी भी गुणात्मक सुधार आना बांकी है.बिहार में १५ सालों के जंगल राज में उपजी हुई और भी बहुत-सी समस्याएं हैं जिनका समाधान नीतीश को अगले पांच सालों में ढूंढ निकालना है और इसी सत्य को अंगीकार करते हुए राज्य को समस्याविहीन राज्य बनाने की दिशा में अग्रसर करना होगा.इसलिए नितीश जी, आपको तो अपनी नीयत में बदलाव लाना ही होगा नहीं तो आपका हश्र भी फिर से आपके बड़े भाई जैसा ही होने वाला है. काठ की हांडी न तो देर तक चढ़ती है और ना दुबारा.

दरअसल बिहारियों के बारे में कहा जाता है कि वे कभी नाउम्मीद नहीं होते। आस की डोर थामे वे पूरी जिंदगी काट लेते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो लालू-राबड़ी पंद्रह सालों तक इस राज्‍य पर शासन नहीं कर पाते। लालू प्रसाद से बंधी उम्मीद की डोर टूटने में पंद्रह साल लगे थे। नीतीश कुमार को पांच साल ही मिले। उनसे इतनी जल्‍दी नाउम्मीद कैसे हुआ जा सकता है। विकास नहीं हुआ तो क्‍या हुआ, विकास की आस तो जगी है। लगातार पंद्रह सालों तक लालू-राबड़ी से मिली निराशा झेल चुके बिहार के लोग महज पांच सालों में नीतीश कुमार से निराश कैसे हो जाते। लिहाजा उन्होंने उनको और पांच साल देने का फैसला किया है।


इस सबसे अलग एक और नयी बात जिन्हें लालू और नितीश द्वय ने बिहार की राजनीति में अपने गुरुभाइयों के संग मिलकर एक नया ट्रेंड स्थापित कर दिया है. बिहार जातियों के खेमों से हटकर दो भागों में बट गया है. अगड़ा और पिछड़ा और ये तय हो गया है की ये खाई पटने वाली नहीं है. क्योंकि नितीश जी अपनी नीतियों की चोट से इसे और चौड़ा और गहरा कर रहे हैं. और इनकी इस चालबाजी ने बिहार की राजनीति में एक अति की जगह पर दूसरी अति को जन्म दे दिया है। अब पता नहीं बिहार में कब ऐसा अवसर आएगा जब मुख्य मंत्री पद का चुनाव करते समय जनता,राजनीतिक दल व विधायक दल अगड़ा-पिछड़ा का ध्यान नहीं रखते हुए किसी नेता की प्रतिभा,योग्यता,कार्य क्षमता,जनसेवा और ईमानदारी को आधार बनाएंगे।वैसे कुछ लोग यह भी कहते हैं कि थेसिस और एंटी थेसिस के बाद सिंथेसिस का समय एक दिन आएगा ही! तबतक के लिए हम तो कहेंगे.

" हमको मालूम है जन्नत की हकीक़त लेकिन
दिल को खुश रखने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है"

Sunday, October 31, 2010

ओबामा की भारत यात्रा बनाम अमेरिका का भविष्य


अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा 2008 में जब पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने तब मीडिया ने उन्हें किस्मत का धनी करार दिया। खुद ओबामा ने भी इस बात को स्वीकारा, लेकिन एक सच यह भी है कि ओबामा ने व्हाइट हाउस में जिस दिन कदम रखा था उसी दिन भाग्य उनका साथ छोड़ गया था। पूर्ववर्ती जॉर्ज डब्ल्यू बुश की सनक भरी नीतियों के परिणामस्वरूप इराक-अफगान युद्ध, आतंकवाद और चरमराई हुई अर्थव्यवस्था जैसी दुष्कर चुनौतियां ओबामा को विरासत में मिलीं। अमेरिकी उन्हें करिश्माई मानते हैं, इसलिए उम्मीदें का बोझ उनके कंधों पर कुछ ज्यादा ही है। ऐसा नहीं कि वह हर मोर्चे पर असफल ही रहे हैं, लेकिन आर्थिक बदहाली ने अमेरिकियों में कुछ ज्यादा ही असंतोष पैदा कर दिया है। इसमें शक नहीं कि ओबामा वादों को पूरा करने का दम रखते हैं। इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी उन्हीं के प्रयासों से हुई। बुश प्रशासन से तुलना करें तो ओबामा के निर्णय बेहतर साबित हुए हैं। रूस-अमेरिका के बीच मित्रता इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, लेकिन बेरोजगार होते अमेरिकी इंतजार नहीं करना चाहते हैं और ना ही उनमे और इंतज़ार करने का दम बचा है। वे बदलाव को विकल्प के रूप में देख रहे हैं। निश्चित रूप से घरेलू मोर्चे पर सफलता पाना आसान नहीं। ओबामा को एक बार फिर भाग्य का सहारा चाहिए। वह छह नवंबर को भारत दौरे पर आ रहे हैं। व्हाइट हाउस के रणनीतिकार भारत दौरे के जरिए अमेरिका में रोजगार सृजन करने के लिए प्रयासरत हैं। भाग्य का खेल देखिए कि अमेरिका में कांग्रेस चुनाव के मात्र चार दिन बाद ओबामा भारत आएंगे।पिछले कुछ दशकों की बात करें तो 80, 90 और 2000 के दशक में अब तक जितने भी कांग्रेस चुनाव हुए उनमें सत्ताधारी दल को जनता के रोष का सामना करना पड़ा। कांग्रेस चुनावों का प्रारूप अमेरिका में कांग्रेस चुनावों को मिड-टर्म इलेक्शन कहा जाता है।इधर कांग्रेस चुनाव (मिड-टर्म इलेक्शन) के प्रति पहले से आशंकित सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी 2012 में राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए बराक ओबामा के नाम पर एकमत नहीं है। हालांकि पार्टी के अधिकतर सदस्य उन्हें अगले राष्ट्रपति चुनावों में भी खड़ा होते नहीं देखना चाहते हैं, लेकिन उनके विरोधियों की संख्या अब पहले की तुलना में बहुत अधिक बढ़ गई है। अगर वह सफल होकर लौटे तो हो सकता है कि वह अमेरिकियों का खोया विश्वास फिर से पा सकें। दरअसल, अमेरिकी सिर्फ आर्थिक बदहाली के चलते ओबामा से नाराज हैं। ओबामा ने अब तक जितने भी एशियाई देशों की यात्रा की, उनमें सामरिक हितों पर अधिक ध्यान दिया, लेकिन भारत दौरे पर ओबामा के एजेंडे में आर्थिक हित सर्वोपरी हैं। विश्लेषक उनके बारे में जो कह रहे हैं-उसमें गलत कुछ भी नहीं। ओबामा जानते हैं कि अमेरिकी उनसे खफा हैं। यही कारण है कि कार्यकाल के शुरुआती दौर में वैश्विक मुद्दों पर ज्यादा ध्यान देने वाले ओबामा पिछले कई महीनों से घरेलू समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं। विश्लेषकों की राय में आर्थिक मंदी, बेरोजगारी, कटौती आदि को मतदाता बेहद खफा हैं। ओबामा ने अपने घर के समीप भीड़ को संबोधित करते हुए कहा, शिकागो, यह जिम्मा आपका है कि आप उन्हें बताएं कि हम कुछ भी नहीं भूले हैं। उनका संकेत पूर्ववर्ती जॉर्ज डब्ल्यू बुश प्रशासन के कार्यकाल में आई मंदी की ओर था। उन्होंने कहा कि चुनाव उन दो तरह की नीतियों के बीच चयन का विकल्प देते हैं, जिनमें एक तो समस्याएं उत्पन्न करती हैं और दूसरी नीतियां देश को सुनहरे भविष्य की ओर ले जाएंगी। पर वैश्विक पटल से ओबामा की दूरी को अंतरराष्ट्रीय मीडिया भलि-भांति जानता है। इससे साफ संकेत मिलता है कि ओबामा घर में पल रहे असंतोष से वाकिफ हैं और अब उन्होंने अमेरिकी अर्थव्यस्था को पटरी पर लाने के लिए कमर कस ली है। अमेरिका में आधारभूत ढांचे पर 50 अरब डॉलर खर्च करने की योजना और भारत यात्रा पर आर्थिक मुद्दे प्राथमिकता में होना इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। देखना यह है कि परिणाम कैसे आते हैं? क्योंकि इन्ही पर भविष्य के अमेरिका की दशा और दिशा तथा ओबामा का भविष्य निर्भर करेगा.

Monday, October 25, 2010

शरद यादव जी आपको हुआ क्या है?


अक्सर देखा यह गया है कि कुछ लोगों की प्रकृति या कहें प्रवृत्ति ऐसी होती है कि उन्हें अच्छाई में भी खोट नजर आने लगती है। किसी सही बात की तारीफ की उम्मीद तो इनसे करना बेकार है, ये तो उसमें भी मीन-मेख निकालने से नहीं चूकते। शायद ऐसी ही प्रवृत्ति जनता दल (यू) अध्यक्ष शरद यादव की भी होती जा रही है। आजकल वे बिना सोचे-समझे टिप्पणी कर देते हैं या कोई मुद्दा उठा देते हैं और बाद में उन्हें मुंह की खानी पड़ती है।
अपनी इसी प्रवृति का एक नया नमूना स्वनामधन्य श्री यादव ने कल पेश किया. शरद यादव ने सोमवार को फतुआ में एक चुनाव रैली को संबोधित करते हुए जेडी (यू) नेता और एनडीए संयोजक शरद यादव ने गांधी परिवार पर तीखे हमले किए। उन्होंने यह भी कहा कि राहुल को गंगा में फेंक देना चाहिए।

उन्होंने कहा, ' मोतीलाल, जवाहरलाल, इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी। अब एक नया बबुआ आ गया है। वह ऐसे करता है (भाषण शुरू करने से पहले आस्तीन चढा़ने की राहुल शैली की नकल उतारते हुए)। '
यादव ने कहा, ' तुमको मालूम क्या है ? कोई कागज पर लिख कर दे देता है और तुम पढ़ देते हो। तुम्हें तो उठाकर गंगा में फेंक देना चाहिए। लेकिन इस देश के लोग भी अजीब हैं.. यह देश बदकिस्मत है। '

दरअसल यादव राहुल की जनसभाओं में जुट रही भी़ड को देखकर बौखला गए है और इसी बौखलाहट में वह इस प्रकार की बातें बोल रहे हैं। उन्होंने राजनीतिक होशो हवास में यह बयान नहीं दिया है। श्री यादव सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष हैं, पर वे अभी भी अपने मुख्यमंत्री की तरह संयत नहीं है. लगता तो यह है की पार्टी में अपने घटते कद ने उनके व्यक्तित्व को भी बौना बना दिया है. शरद यादव ऊपर से बहुत घबराहट में हैं, लेकिन अंदर से मुस्कुरा रहे हैं. उन्होंने अपने अटपटे भाषण से राहुल और नीतीश दोनों पर निशाना साधा है. उन्होंने राहुल और उनके स्वतंत्रता सेनानी परिवार की कटु आलोचना करते हुए कहा है कि भाषण देते हुए अपने कुरते की आस्तीन चढ़ाने वाले राहुल को गंगा में फेंक देना चाहिए.
उनको जो बोलना था, वे पूरी चालाकी के साथ बोल गए लेकिन, इससे नीतीश के लिए चुनावी रास्ता कठिन हो गया, क्योंकि शरद ने चुनावी मुद्दा ही बदल दिया और जो मुद्दा बढ़ाया है, वह घनघोर आलोचनों का शिकार होगा ही. अब शरद यादव की पार्टी जदयू भाजपा के साथ है, जो आरएसएस की एक इकाई है और आरएसएस ने तो कभी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन तक नहीं किया, उलटे उसने उस अभिनव भारत का साथ दिया जिसके एक सदस्य ने महात्मा गाँधी की ह्त्या कर दी थी. इस प्रकार शरद यादव ने जदयू के एक तीर(छाप) से दो-दो निशाने साधे और नीतीश को बता दिया कि वे उसके सामने दादागिरी न दिखाया करें.
इधर नीतीश, जदयू को अपनी जागीर की तरह देखने लग गए हैं. शरद जी को चटनी समझने लग गए हैं, सो शरद जी ने उनको समाजवादी दांव दिखला दिया है.
चाहे कुछ भी हो, शरद जी को भाजपाई लोगों के साथ रहते-रहते स्वतंत्र सेनानिओं के खिलाफ बोलने की भाजपाई-बीमारी लग गई है. भाजपाई लोग महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, डा. राजेंद्र प्रसाद आदि की आलोचना किया करते थे, लेकिन वे मोती लाल नेहरू की आलोचना नहीं किया करते थे, परन्तु शरद जी ने मोती लाल नेहरू से लेकर राहुल गाँधी तक की आलोचना कर और व्यक्तिगत आक्षेप कर, एक नया रिकार्ड बना दिया है. लेकिन, यह रिकार्ड नीतीश का भी रिकार्ड ख़राब कर देगा. पर शरद जी को क्या गम कि नीतीश की सरकार बिहार में फिर बने न बने.....नीतीश को पार्टी पर हावी होने की सजा तो मिलनी ही चाहिए. सो उन्होंने सजा दे दी है और अपने चुनावी भाषण का स्वयं लाभ उठा गए हैं.
अगर नीतीश को पता होता की शरद जी ऐसा गुल खिलायेंगे तो, वे उनको भी नरेंद्र मोदी की श्रेणी में रख देते. वरुण गाँधी की श्रेणी में रख देते- कट्टर सांप्रदाइक श्रेणी में रख देते.

अपने को असली और श्रेष्ठ सेक्यूलर मानने वाले नीतीश जी का मानना है कि भाजपा घटाव नरेन्द्र मोदी, घटाव वरुण गाँधी, एक विशुद्ध सेक्यूलर पार्टी है और अगर लोहिया जी जीवित होते तो वे आरएसएस और भाजपा की दोहरी सदस्यता ले लेते. आचार्य नरेंद्र देव जीवित होते तो वे समाजवाद में भाजपा के योगदान पर नीतीश के चश्मे से एक कीताब लिख डालते और उसे बुकर पुरस्कार मिलता.

अभी कुछ दिनों पहले भी ऐसे ही प्रयास के तहत उन्होंने संसद में यह मांग कर डाली कि धारावाहिक `बालिका वधू' में बालविवाह को प्रोत्साहन दिया जा रहा है इसलिए इसे बंद किया जाना चाहिए। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने इसकी जांच करने का आश्वासन दिया। जांच में पाया गया की सीरियल के बारे में शरद यादव ने जो शिकायत की है वह सच नहीं है। सीरियल को सरकार ने क्लीन चिट दे दी और शरद यादव अपना सा मुंह लेकर रह गये। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब शरद यादव जी को अपने कथन पर झेंपना पड़ा हो। संसद पद के लिए महिलाओं की आरक्षित सीटों को बढ़ाने का प्रयास वर्षों से चल रहा है। राजनेता ही ये सीटें बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, इसके लिए ख्वाहिशमंद हैं और उनके बीच के ही कुछ लोग इसमें अडंगा डाल रहे हैं। इस बार जब महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने की बात उठी तो शरद यादव आपे से बाहर हो गये। वे तमतमा गये और भरी संसद में उन्होंने ललकारा -विधेयक पारित हुआ तो मैं फांसी लगा कर आत्महत्या कर लूंगा।' ऐसा एलान कर वे खुद तो हास्यास्पद बने ही अपनी पार्टी की भी रही सही इज्जत की लुटिया डुबो दी। शरद जी तपेतपाये नेता हैं। वर्षों से राजनीति में हैं। कहें तो राजनीति घोल कर पी गये हैं फिर उनसे ऐसी भयंकर भूल कैसे हो जाती है। संभव है कि यह उनका प्रचार पाने का कोई तरीका हो, क्योंकि ऐसे तो वे खबरों में कम ही आते हैं। इस तरह की गिमिक करते रहेंगे तो सुर्खियों में तो रहेंगे ही। अखबारों का भी क्या कहें उनकी आत्महत्या की हुंकार की खबर प्रमुखता से छपी। हालाँकि कोंग्रेस ने चुनाव आयोग से इस घटना पर संज्ञान लेते हुए शरद यादव पर कड़ी कारवाही की मांग की है पर मैं तो अभी भी यही मानती हूँ की "खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे". बेचारे शरद यादव क्या करेंगे. पहले उलटे बयान देंगे और फिर वापिस लेंगे. अब बेचारे गंभीर मुद्रा में सोच रहे हैं "ये क्या बोल गए शरद बाबू"

Monday, August 30, 2010

गर्भ रुदन

मैं अजन्मी
हूँ अंश तुम्हारा
फिर क्यों गैर बनाते हो
है मेरा क्या दोष
जो, ईश्वर की मर्जी झुठलाते हो
...
मै माँस-मज्जा का पिण्ड नहीं
दुर्गा, लक्ष्मी औ‘ भवानी हूँ
भावों के पुंज से रची
नित्य रचती सृजन कहानी हूँ

लड़की होना किसी पाप
की निशानी तो नहीं
फिर
मैं तो अभी अजन्मी हूँ
मत सहना मेरे लिए क्लेश
मत सहेजना मेरे लिए दहेज
मैं दिखा दूँगी
कि लड़कों से कमतर नहीं
माद्दा रखती हूँ
श्मशान घाट में भी अग्नि देने का

बस विनती मेरी है
मुझे दुनिया में आने तो दो!!

Thursday, July 29, 2010

स्त्री


क्या तुम जानते हो एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण ?

बता सकते हो तुम एक स्त्री को स्त्री द्रष्टि से देखते उसके स्त्रीत्व की परिभाषा ?

अगर नहीं तो फिर जानते क्या हो तुम रसोई और बिस्तर के गणित से परे

एक स्त्री के बारे में….?

जानने की कोशिश करो पर पहले तो बदलो अपनी दृष्टि को

एक पुरुष की जगह एक पुत्र, एक भाई एक पिता बनो

ओढ़ता,बिछाता,और भोगता शरीर को जीता पुरुष

शरीर के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता उसका प्यार-दुलार,मनुहार

सभी कुछ शरीर की परिधि से बंधा होता है…

लेकिन औरत, शरीर के बाहर भी बहुत कुछ होती है…

वह होती है जननी और सृष्टा मानव जाती की

वह होती है शक्ति दुर्गा, काली, लक्ष्मी, और सरस्वती

शक्ति का अपूर्व भंडार जो भरता है तुम्हारी रगों में

इसलिए जितना सताओगे उतना उठुगीं

जितना दबाओगे उतना उगुगीं

जितना बाँधोगे उतना बहूंगी

जितना बंद करोगे उतना गाऊँगी

जितना अपमान करोगे उतनी निडर हो जाउंगी

जितना सम्मान करोगे उतनी निखर जाउंगी

Thursday, July 8, 2010

दिल्ली की बारिश: डर लागे गरजे बदरिया

दिल्ली की बारिश मानो लौटरी, दिल्ली तक आते-आते बादलों का हाथ तंग हो जाता है, सो सोच समझ बरसते हैं। खैर दिल्ली में हर काम में सोचा जयादा जाता है, किया कम जाता है। चाहे वो नेता हों या जनता। बादलो को यह भाषा दिल्ली में घुसते ही समझ आ जाती है फिलहाल हाल तो हमेशा की तरह यही है की बारिश न हो तो समस्या और अगर हो जाए तो दिल्ली वालों की मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं।दिल्ली में मंगलवार सुबह हुई झमाझम बारिश ने दिल्ली वासियों से मुरझाये चेहरे पर खुशी की लहर ला दी. सुलगती गर्मी के आतंक से झुलसती दिल्ली ने बारिश की बुंदों से राहत की सांस ली है। सुबह हुई बारिश ने तापमान काफी कम कर दिया जिसके कारण मौसम बेहद सुहावना हो गया था. पर मंगलवार के बाद हालाँकि कल बुधवार को दिल्ली में हुई बारिश की मात्र कुछ खास नहीं मात्र २१.२ मिमी ही थी, पर इतनी ही बारिश दिल्ली की सिविक एजेंसियों की तैयारी को दिखने के लिए काफी था. दिल्लीवासियों के लिए यह एक भयावह मंजर था. मेरी एक घनिष्ठ मित्र जो की एक निजी बैंक में काम करती हैं उन्होंने बताया की जैसे ही उन्होंने डीएनडी फ्लायओवर का गेट पार किया और रिंग रोड पर पहुंची तो करीबन चार घंटे तक वह रिंग रोड पर ही फँसी रही. किसी तरह उन्होंने अपनी कार शांति पथ की तरफ मोड़ी तो उधर भी जाम. अंततः वह अपने घर नारायणा पहुंची पर करीब ६ घंटे के बाद. अन्य मार्गों पर ट्रेफिक रेंगता तो रहा पर सबसे बुरी हालत थी सेन्ट्रल, दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली की. धौला कुआँ पर ग्रेड विभाजक का एक हिस्सा तो पानी में ऐसा डूबा की उसे बंद करना पड़ा और उसका असर तुरंत दिखा शांति पथ, मोती बाग, अफ्रीका अवेन्यु मार्ग, सरदार पटेल मार्ग, रिज रोड, इन सबों पर ऐसा ट्रेफिक जाम हुआ की सेन्ट्रल दिल्ली से आने वाले ट्राफिक के लिए इन्हें बंद करना पड़ा. मंगलवार की बारिश के बाद राजधानी के कई अंडरपास और फ्लाई ओवरों के ढलानों पर भरा पानी बुधवार की दोपहर तक भी निकल नहीं पाया था। बुधवार दोपहर बाद हुई तेज बारिश से धौला कुआं अंडरपास लबालब हो गया, जिसकी वजह से आसपास के सभी रास्तों पर भारी जाम लग गया। आर.के. पुरम और मुनीरका तक गाड़ियों की कतारें लगी हुई थीं, तो दूसरी तरफ दिल्ली कैंट तक जाम था। वाहन चालकों ने तीन मूर्ति और ग्यारह मूर्ति का रुख किया, तो वहां भी कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया। स्विमिंग पूल बन चुके धौला कुआं अंडरपास के सामने ट्रैफिक पुलिसवाले बेबस नजर आए। ग्रीन पार्क से युसूफ सराय के बीच सड़क का एक बड़ा हिस्सा धंस जाने से अरबिंदो मार्ग जाम हो गया. हालात तो और ख़राब तब हो गए जब की कई ट्राफिक सिग्ननल बारिश और पॉवर कट की वजह से फेल हो गए और चौराहों और सड़कों पर बिलकुल अराजक स्थिति उत्पन्न हो गयी. एम् बी रोड पर एक भी सिग्नल काम नहीं कर रहा था. गाड़ियाँ रोंग साइड चल रही थी और एक एक क्रोसिंग पार करने में १५ से २० मिनट लग रहा था. सुनने में यह भी आया की आश्रम और सराय काले खान के बीच वी आइ पी मोवेमेंट की वजह से करीब आधे घंटे के लिए डी एन डी फ्लाय ओवर को बंद किया गया था पर उसकी वजह से जो जाम शुरू हुआ वह इंडिया गेट तक फ़ैल गया क्योंकि ये सारे इलाके थोड़ी देर के लिए ही सही ट्राफिक मोवेमेंट के लिए रोक दिए गए थे ताकि वी आइ पी को कोई अवरोध ना मिले. पर यह एक सच्चाई है की सिविक एजेन्सिएस यथा एमसीडी की गैर दूरंदेशी का नतीजा आखिरकार वही हुआ जिसकी आशंका थी। मॉनसून की पहली ही बारिश में एमसीडी के तमाम दावे धरे रह गए और जगह-जगह हुए जलभराव से लोगों को दिक्कतें हुईं। सोमवार को तो बंद की वजह से सड़कों पर ट्रैफिक बहुत कम था, इसलिए हालात सामान्य लग रहे थे, लेकिन मंगलवार सुबह राजधानी के कई इलाकों में हुई तेज बारिश के बाद जब लोग घरों से निकले, तो उन्हें जगह-जगह सड़क पर भरे पानी के बीच से गुजरना पड़ा। इस साल भी ट्रैफिक पुलिस ने मॉनसून से काफी पहले एमसीडी को आगाह कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद वैसा ही हुआ जैसा हर साल होता है। कई सड़कें स्विमिंग पूल में तब्दील हो गई और ट्रैफिक जाम के हालात बन गए। कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए चल रहे निर्माण कार्यों की वजह से पहले ही दिल्ली की सड़कों की हालत खस्ता है, ऐसे में मॉनसून की पहली बारिश से यह भी साफ हो गया कि आने वाले दिन और भी मुश्किल भरे हो सकते हैं।
सबसे ज्यादा जलभराव राजधानी के अंडरपास और फ्लाईओवरों के ढलानों पर हुआ। अशोक विहार के पास लॉरेंस रोड पर बने जिस नए-नवेले अंडरपास का दो दिन पहले ही धूमधाम से उद्घाटन किया गया था, उसमें मंगलवार को बारिश के बाद घुटने-घुटने तक पानी भर गया। पानी भर जाने की वजह से कई वाहन यहां से गुजरते वक्त खराब होकर बंद हो गए, जिन्हें धक्का लगाकर निकालना पड़ा। इसकी वजह से आसपास के रास्ते पर लंबा जाम लग गया। धौलाकुआं, द्वारका, मूलचंद, प्रेम बाड़ी और वजीरपुर इंडस्ट्रियल एरिया स्थित रेलवे अंडरपास का भी यही हाल हुआ। यहां भी जलभराव से ट्रैफिक पर असर पड़ा और जाम के हालात बने रहे।इसके अलावा शादीपुर, मोती बाग, पंजाबी बाग, कीर्ति नगर और जखीरा जैसे व्यस्त फ्लाईओवरों के ढलानों पर जलभराव की वजह से देर तक जाम लगा रहा। मायापुरी-रिंग रोड क्रॉसिंग, नारायणा टी पॉइंट, मोती नगर, कर्मपुरा, जीटी करनाल डिपो, जहांगीरपुरी कैरिज वे, ब्रिटानिया चौक और संसद विहार से पीतमपुरा पुलिस लाइन की तरफ जाने वाले रास्ते पर जलभराव से जाम के हालात बने रहे। वेस्ट पटेल नगर में बारिश से ठीक पहले केबल डालने के लिए सड़क खोदी गई थी, लेकिन बारिश के बाद उसमें पानी भर गया और मंगलवार को एक कार उसमें फंस गई। कार चालक बाल-बाल बचा। उधर, कनॉट प्लेस में भी बारिश के बाद बुरा हाल हो गया और दोपहर में यहां भी जाम लगा रहा। यहां चल रहे निर्माण कार्य की वजह से पहले ही पैदल चलना दूभर हो गया था, ऐसे में बारिश के बाद हालात और खराब हो गए। यहां जगह जगह पानी भर गया और कीचड़ जमा हो गया। ट्रैफिक पुलिस के मुताबिक , मंगलवार को ट्रैफिक हेल्पलाइन पर सुबह से शाम तक जलभराव की वजह से जाम लगने संबंधी 15 कॉल्स आईं , जबकि एमसीडी के सेंट्रल कंट्रोल रूम में जलभराव संबंधी 55 और पेड़ गिरने की 4 कॉल आईं। जलभराव की सबसे ज्यादा 13 कॉल्स रोहिणी जोन से आई , जबकि 11 कॉल्स साउथ जोन से आई। ट्रैफिक पुलिस का मानना है कि अगर एमसीडी के इंतजामों का यही हाल रहा , तो आने वाले दिन वाहन चालकों के लिए और भी मुश्किल भरे हो सकते हैं।
वास्तविकता तो यह है की राजधानी दिल्ली हर मानसून में भीगी बिल्ली बन बैठती है। यह प्रशासन को भी पता होता है कि मानसून में बारिश होगी और पानी भरेगा। इसकी तैयारियों के लिए ड्रेनेज सफाई के नाम पर पैसे भी पानी की तरह बहते हैं। पानी निकासी की परियोजनाएं ागजों पर पैसे की निकासी की जाती है। इंतजाम की पोल मानसून खोलता है। बरसाती नालों पर अवैध कब्जों से प्राकृतिक जल निकासी की व्यवस्था नहीं रही, कृत्रिम अव्यवस्था का अंजाम जनता भोगे।

प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो

आज काफी समय बाद थोडा चैन से बैठी हूँ . एक पुराना अखबार हाथ लगा और उसमे एक खबर थी मॉडल विवेका बालाजी की आत्महत्या की. खबर पढ़ते ही मुझे याद आ गई मधुर भंडारकर की रियल टाइम मूवी फैशन की और याद आया एक किरदार कंगना रानावत ने निभाया था. मॉडलिंग की दुनिया का वह नंगा सच जो मधुर ने दिखने की कोशिश की थी एक बार फिर नग्नता की पराकाष्ठा के साथ हमारी नजरों के सामने था. विवेका बाबजी की आत्महत्या के कारणों की बात जब भी उठती है, गौतम वोरा का नाम जरूर आता है। प्राय: सभी का मानना है कि अगर गौतम ने उसके साथ बेवफाई न की होती, तो वह आज जीवित ही नहीं, स्वस्थ-प्रसन्न होती। विवेका ने आत्महत्या की रात अपनी डायरी में लिखा था, यू किल्ड मी, गौतम। यह किसी ऐसे व्यक्ति की कराह लगती है जिसे अपने जीवन का सबसे बड़ा झटका लगा हो। इसीलिए सबकी सहानुभूति विवेका के साथ है। गौतम वोरा सबकी निगाह में खलनायक हो गया है। एक पत्रकार ने तो यहां तक लिख डाला कि विवेका की जान इसलिए गई कि उसने गलत आदमी का चुनाव किया था। गौतम वोरा के अलावा कोई और नहीं जानता न जान सकता है कि विवेका के साथ उसका रिश्ता क्या था? शायद विवेका भी नहीं जानती थी। अगर जानती होती, तो वह इतने विषाद में न पड़ती कि मृत्यु के चयन के अलावा उसे कोई और रास्ता न दिखाई पड़े। वैसे प्रेम में निराशा या बेवफाई का सदमा जरूरी नहीं कि आदमी को खुदकुशी की ओर ले जाए। आत्महत्या के मनोविज्ञान का अध्ययन करने वालों का कहना है कि कोई भी घटना सभी व्यक्तियों को एक ही तरह से प्रभावित नहीं करती। ऐसे भी लोग हैं जो मामूली-सी बात पर आत्महत्या कर लेते हैं। दूसरी तरफ, कुछ व्यक्तित्व इतने मजबूत होते हैं कि बड़ी-बड़ी घटनाओं को अपने ऊपर हावी होने नहीं देते। सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि दुनिया की आपकी समझ कैसी है। विवेका के अनेक मित्रों और परिचितों ने उसकी स्थिति और उसके मनोविज्ञान पर प्रकाश डालने की कोशिश की है। इनसे संकेत मिलता है कि उसका दुख किसी एक तरह का नहीं था। हो सकता है, बेवफाई के एहसास ने विवेका को उस बिंदु पर पहुंचा दिया हो जहां से लौट कर कोई वापस नहीं आता। गौतम से अपने संबंध को विवेका जिस तरह से समझ रही थी, जरूरी नहीं कि विवेका से अपने संबंध को गौतम भी उसी स्तर पर महसूस कर रहा होगा। कोई और आदमी यह भी ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि दोनों के बीच जो संबंध था, उसे प्रेम के नाम से परिभाषित करना तर्कसंगत होगा या नहीं। प्रेम भी सबके लिए एक ही अर्थ नहीं रखता। एक बार महात्मा गांधी ने कहा था कि धर्म उतने हो सकते हैं जितने लोग धरती पर रहते हैं। कारण, ईश्र्वर से सबका रिश्ता अपना-अपना होता है और नैतिकता की सबकी समझ भी अपनी-अपनी होती है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि प्रेम भी उतनी तरह का हो सकता है जितनी तरह के लोग धरती पर रहते हैं। इसलिए कोई दूसरे के प्रेम की तुलना अपने प्रेम से क्यों करे। नि:संदेह बेवफाई बुरी चीज है, लेकिन कोई बेवफाई करता क्यों है? इसे समझे बिना दोष निरूपण का तरीका न्यायसंगत नहीं हो सकता। जीवन के दूसरे संबंधों की तरह, प्रेम को भी हम एक स्थायी बंदोबस्त मानने के आदी हैं। जीवन में और खासकर संबंधों में कुछ भी स्थाई नहीं होता। स्थाई हो ही नहीं सकता, ऐसा नहीं है। ज्यादातर संबंध स्थाई ही होते हैं, खासकर जब वे विवाह में परिणत हो जाते हैं, लेकिन बिना विवाह के भी आखिरी सांस तक प्रेम के अनेक उदाहरण दिखाई पड़ते हैं। जब हम किसी संबंध में उतरते हैं, तो यह मानकर ही उतरते हैं कि यह अनंत भविष्य तक जारी रहेगा। हमारे यहां जनम-जनम के साथ की बात की जाती है, हालांकि अधिकांश युगल दिली तौर पर नहीं चाहते होंगे कि अगले जन्म में भी यही साथ मिले। संबंध अक्सर पुराने जूतों की तरह हो जाता है, जिनमें हमारे पैर आराम महसूस करते हैं। इसके बावजूद, जब जूते फट जाते हैं तो उन्हें बदलना ही पड़ता है। ईश्र्वर का लाख-लाख धन्यवाद कि उसने हमें पिछले जन्मों की स्मृतियों से वंचित कर रखा है। नहीं तो यह दुनिया नरक हो जाती। जब एक शरीर के विनाश के बाद आत्मा नए वस्त्र पहनती है और जीवन की एक नई इकाई के रूप में दुनिया में लौटती है, तो उसे नए संगी-साथी चाहिए होते हैं। इसी तरह, क्या एक ही जन्म में आदमी बार-बार मरता और फिर-फिर नहीं पैदा होता है? तो क्या आदमी को अपनी प्रतिश्रुति से बंधा नहीं होना चाहिए? अगर सभी लोग क्षण में जीना शुरू कर दें और आज के व्यवहार तथा कल के व्यवहार में कोई तारतम्य न रह जाए, तो इससे जो अराजकता पैदा होगी, उसे हममें से कौन सह सकता है? क्षण सत्य है, पर क्षणों का सिलसिला भी कम सत्य नहीं है। इसलिए परिवर्तन और निरंतरता, दोनों के मेल से ही जीवन में खुशबू आती है। जो वादे कानूनी तौर पर किए जाते हैं, उन्हें निभाना किसी भी आदमी का न्यूनतम कर्तव्य है। ऐसे वादों को कानून की शरण में जा कर ही तोड़ा जा सकता है। नहीं तो दुनिया चल नहीं सकती। इसके विपरीत, व्यक्तिगत स्तर पर किए गए वादे को उस क्षण का वादा समझकर चलने में ही भलाई है। जब कोई लड़की किसी लड़के से कहती है-आइ लव यू, तो यह उसकी उस क्षण की भावना है। और, किसी भी भावना को शाश्र्वत मानकर नहीं चला जा सकता। जब कोई जीवन किसी एक क्षण से बंध जाता है, तो वह जंजीर की फंसावट का शिकार हो जाता है। जीवन तभी तक मजेदार है, जब तक वह स्वतंत्र है। यह मान कर चलना ही सत्य के साथ तंदुरुस्त रिश्ता बनाना है।