Saturday, November 27, 2010

क्या बदल गया बिहार?


हिटलशाही के दौर में एक कहावत बहुत मशहूर हुई थी. एक झूठ को सौ बार बोलो, वो सच हो जाएगा. और बकायदा झूठ को प्रचारित करने के लिए हिटलर ने एक मंत्री की भी नियुक्ति की थी. ताजा उदाहरण बिहार सरकार है. विकास और सुशासन की छवि, जो यहां बनी नहीं बनाई गई है, उसमें भी इसी फॅर्मूले का इस्तेमाल किया गया है. यानि, जितना विकास हुआ नहीं उससे कहीं ज्यादा इसके बारे में लोगों को बताया जा रहा है. और,बार-बार बताया जा रहा है. जाहिर है, इसके लिए मीडिया का सहारा लिया गया और जम कर विज्ञापन बांटे गए. सूबे के मुख्यमंत्री नीतीशकुमार के चार साल के कार्यकाल में करीब 65 करोड रूपये से भी ज्यादा के विज्ञापन विभिन्न अखबारों और न्यूज चैनलों को बांटे गए. जाहिर है, बुलबुल भी वैसी ही नाचेगी जैसे पैसा देने वाला चाहता है. हुआ भी ऐसा ही. करोडों का विज्ञापन लेने के बाद मीडिया ने भी बिहार की ऐसी छवि बनाई मानो सचमुच बिहार अब भूखमुक्त,भयमुक्त, भ्रष्टाचरमुक्त हो गया है.मीडिया ने नीतीश कुमार की जितनी बड़ी छवि गढ़ी है, बिहार की जनता ने उससे कई गुना बड़ा जनादेश उनको दिया है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बिहार विधानसभा में अब तकनीकी तौर पर विपक्ष वजूद ही समाप्‍त हो गया है। मुख्‍य विरोधी दल का दर्जा पाने के लिए किसी एक दल के खाते में कुल सीटों का दस प्रतिशत सीट होना चाहिए। लेकिन चुनावी नतीजे बता रहे हैं कि राजद-लोजपा 25 सीटों पर ही निपट गये। प्रथम मुख्‍यमंत्री श्रीकृष्‍ण सिंह और राबड़ी देवी के बाद नीतीश कुमार पहले मुख्‍यमंत्री है, जिन्हें लगातार दूसरी बार बिहार का मुख्‍यमंत्री बनने का अवसर मिला है। इस भारी जीत की चुनौतियां कितनी भारी हैं, इसे नीतीश कुमार से अधिक और कौन समझ सकता है। यही वजह है कि नतीजे आने के तुरंत बाद नीतीश कुमार जब मीडिया से मुखातिब हुए, तो चुनौतियों के बोझ तले दबे दिखे। उन्होंने कहा, मैं काम करने में भरोसा रखता हूं। मेरे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। मैं दिन-रात मेहनत करूंगा। बिहार के लोगों ने मुझमें जो विश्वास जताया है, वही मेरी पूंजी हैं। अब बात बनाने का समय नहीं है। काम करने का समय है

दरअसल, नीतीश सरकार ने मीडिया की कमजोरी को पहचान लिया था . और, यह कमजोरी है, विज्ञापन की. अफरोज आलम ने बिहार सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग से आरटीआई के तहत राज्य सरकार द्वारा जारी की गई विज्ञापन के बारे में सूचनाएं मांगी थी. प्राप्त सूचना से पता चलता है कि सरकार का काम पर कम, विज्ञापन करने पर ज़्यादा ध्यान रहा है. सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की ओर से साल 2005 से 2010 के बीच(नीतीश कुमार के कार्यकाल के चार सालों में) लगभग 64.48 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए. जबकि लालू-राबड़ी सरकार के कार्यकाल के अंतिम 6 सालों में महज 23.90करोड़ ही खर्च हुए थे. मिली सूचना के मुताबिक सूचना एवं जन-सम्पर्क विभाग ने साल 2009-10 में (28 फरवरी 2010 तक)19,66,11,694 (लगभग 20 करोड) रूपये का विज्ञापन जारी किया है,जिसमें से 18,28,22,183 (लगभग 18 करोड से ज्यादा) रूपये का विज्ञापन प्रिन्ट मीडिया को और 1,37,89,511(लगभग डेढ करोड) रूपये का विज्ञापन इलेक्ट्रॅानिक मीडिया को दिया गया. इतना ही नहीं,नीतीश सरकार के चार वर्ष पूरे होने पर एक ही दिन1,15,44,045(लगभग 1 करोड से ज्यादा) रूपये का विज्ञापन एक साथ 24 समाचार पत्रों को जारी किया गया. इसमें भी सबसे ज्यादा एक खास समूह के अखबार को दिया गया. कुछ खास अखबारों को तो अकेले 50 लाख रूपये से ज्यादा का विज्ञापन दिया गया है.

अब ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार की असली तस्वीर और विकास की कमजोर चारदीवारी के पीछे का सच दिखा पाना ऐसे अखबारों के लिए कितना मुश्किल है. क्योंकि जब आप सच दिखाएंगे या छापेंगे तो विज्ञापन कैसे मिलेगा? और ऊपर से तुर्रा ये की बिहार में विजय की पताका फेहराने वाले नीतीश कुमार ने स्वयं को निमित्त मात्र बता कर सारी ताकत जनता को कह दिया हैं। बिहार में इतिहास बनाकर नीतीश कुमार ने देश को संदेश तो दे दिया है कि काम के आगे सारे समीकरण बेकार हैं? पर क्या कोई काम हुआ भी है. या मात्र हवाई किले ही बनाये गए हैं. प्रधान मंत्री ग्राम योजना के तहत बनायीं गयी सड़कें हो या राजीव गाँधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना से आई बिजली. सब कुछ तो केंद्र का है और केंद्र की एजेंसियों से कराया हुआ. उसमें भी जितना जनता तक पहुँचाना था वो पंहुंचा ही नहीं. "यानी बन्दर के हाथ लगी अदरक की गाँठ और बन बैठा पंसारी" . वास्तविकता में बिहार की 52 फीसदी आबादी आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करती है। बिहार की प्रति व्‍यक्‍ित आय 13 हजार रुपये सालाना है, जो देश की प्रति व्‍यक्ति आय 41 हजार रुपये सालाना से बहुत पीछे है। बिजली की भारी किल्‍लत के कारण इस राज्‍य में कल-कारखाने पनप नहीं पा रहे हैं और उद्योग-धंधे के नाम पर किसी प्रकार का निवेश नहीं है. तो फिर कौन सा विकास और काहे का. सब हवा हवाई है.

बहुत दिन नहीं हुए उस बात को जब मात्र एक छोटी सी घटना पर नितीश जी इतने नाराज हुए की उन्होंने गुजरात सरकार की पांच करोड़ रूपए की सहायता वापिस कर डाली पर ऐसा करते हुए वे अपने समाजवादी गुरु किशन पटनायक को भूल गए जिनकी अगुवाई में उन्होंने उस समाजवाद की शिक्षा ली थी जो भारतीयता से ओतप्रोत थी. जिसमें भारत के हर कोने का नागरिक एक समान था और डॉक्टर लोहिया से लेकर जयप्रकाश नारायण रहे हों या फिर किशन पटनायक, सबका मानना था कि पूरे देश के नागरिक को देश के हर इलाके में आने-जाने और रहने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उनकी इस सोच का मतलब साफ था कि इससे भारतीय गणराज्य का नागरिक सही मायने में पूरे भारत को अपना मान सकेगा और क्षेत्रीयता की धारणा से उपर उठ सकेगा। पर गुजरात के नागरिकों के स्नेह से सना पैसा उन्होंने मात्र इसलिए लौटा दिया ताकि बिहार के १२% अल्पसंख्यक वोटों को अपनी ओर खींचा जा सके. और ऐसी ही कितनी कलाबाजियां उन्होंने दिखाई हैं.

नितीश जी को ये भी ध्यान से देखना होगा की २००५ का चुनाव उन्होंने अगर लालूराज के खिलाफ गोलबंद वोटों के दम पर जीता था तो उनके सहयोगी दल के साथ उनके दोयम व्यवहार के बावजूद उसी दल ने ११० में से करीब ९१-९२ सीटें जीत कर अपनी ताकत दिखा दी है. और इस बार भी जनता के उसी दर का इस्तेमाल किया फिर से नितीश जी ने ये कहते हुए की अगर कांग्रेस को वोट देंगे तो वह फिर से लालू को जाएगा क्योंकि वे UPA के घटक हैं और दिखावे की राजनीति कर रहे हैं. फिर अपना पुराना दांव सफलता पूर्वक चलकर नितीश जी ने छद्म करिश्मे की सूरत गढ़ते हुए अपने पुराने गुरुभाई लालू जी की तरह जनता को बेवक़ूफ़ बनाने की कला में माहिर हो गए हैं.


एक और चीज इस चुनाव में सामने दिखी. जनता से अपने काम की मजूरी मांगते नितीश कुमार के अधिकाँश सहयोगी या तो करोडपति हैं या बाहुबली. अब ये कौन बताये की आम बिहारी की गरीबी को ये कैसे दूर करेंगे जिनकी जिम्मेदार वे खुद ही हैं. .ध्यान देने योग्य बात यह भी है की इन चुनावों में राजग को मात्र ४१-४२ % जनता का वोट मिला है लेकिन इसी अल्पमत के बल पर उसने तीन चौथाई सीटें जीत ली हैं.यह शुरू से ही हमारे लोकतंत्र की बिडम्बना रही है कि देश में हमेशा अल्पमत क़ी सरकार बांटी रही है.देखना है कि सरकार जनता को किए गए वादों में से कितने को पूरा कर पाती है.प्रचार अभियान के दौरान राजग ने बिजली,रोजगार सृजन और भ्रष्टाचार सम्बन्धी नए कानून के क्रियान्वयन का वादा किया था.डगर आसान नहीं है.खासकर भ्रष्टाचार ने जिस तरह से शासन-प्रशासन के रग-रग में अपनी पैठ बना ली है.उससे ऐसा नहीं लगता कि नीतीश भ्रष्टाचारियों खासकर बड़ी मछलियों की संपत्ति पर आसानी से सरकारी कब्ज़ा कर उसमें स्कूल खोल पाएँगे जैसा कि उन्होंने अपने भाषणों में वादा किया था.पिछली बार से कहीं ज्यादा आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग राजग की तरफ से जीत कर विधानसभा में पहुंचे हैं.इन पर नियंत्रण रखना और इन पर मुकदमा चलाकर इन्हें सजा दिलवाना भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती रहेगी.अगले साल बिहार में पंचायत चुनाव होनेवाले हैं.राजग सरकार इसे दलीय आधार पर करवाना चाहती है.अगर ऐसा हुआ तो निश्चित रूप से इन चुनावों में भी राजग जीतेगा और सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाएगी.राज्य में पंचायत स्तर पर और जन वितरण प्रणाली में जो व्यापक भ्रष्टाचार है वह किसी से भी छुपा हुआ नहीं है.हालांकि गांवों में शिक्षामित्रों की बहाली कर दी गई है लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता में विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक में अभी भी गुणात्मक सुधार आना बांकी है.बिहार में १५ सालों के जंगल राज में उपजी हुई और भी बहुत-सी समस्याएं हैं जिनका समाधान नीतीश को अगले पांच सालों में ढूंढ निकालना है और इसी सत्य को अंगीकार करते हुए राज्य को समस्याविहीन राज्य बनाने की दिशा में अग्रसर करना होगा.इसलिए नितीश जी, आपको तो अपनी नीयत में बदलाव लाना ही होगा नहीं तो आपका हश्र भी फिर से आपके बड़े भाई जैसा ही होने वाला है. काठ की हांडी न तो देर तक चढ़ती है और ना दुबारा.

दरअसल बिहारियों के बारे में कहा जाता है कि वे कभी नाउम्मीद नहीं होते। आस की डोर थामे वे पूरी जिंदगी काट लेते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो लालू-राबड़ी पंद्रह सालों तक इस राज्‍य पर शासन नहीं कर पाते। लालू प्रसाद से बंधी उम्मीद की डोर टूटने में पंद्रह साल लगे थे। नीतीश कुमार को पांच साल ही मिले। उनसे इतनी जल्‍दी नाउम्मीद कैसे हुआ जा सकता है। विकास नहीं हुआ तो क्‍या हुआ, विकास की आस तो जगी है। लगातार पंद्रह सालों तक लालू-राबड़ी से मिली निराशा झेल चुके बिहार के लोग महज पांच सालों में नीतीश कुमार से निराश कैसे हो जाते। लिहाजा उन्होंने उनको और पांच साल देने का फैसला किया है।


इस सबसे अलग एक और नयी बात जिन्हें लालू और नितीश द्वय ने बिहार की राजनीति में अपने गुरुभाइयों के संग मिलकर एक नया ट्रेंड स्थापित कर दिया है. बिहार जातियों के खेमों से हटकर दो भागों में बट गया है. अगड़ा और पिछड़ा और ये तय हो गया है की ये खाई पटने वाली नहीं है. क्योंकि नितीश जी अपनी नीतियों की चोट से इसे और चौड़ा और गहरा कर रहे हैं. और इनकी इस चालबाजी ने बिहार की राजनीति में एक अति की जगह पर दूसरी अति को जन्म दे दिया है। अब पता नहीं बिहार में कब ऐसा अवसर आएगा जब मुख्य मंत्री पद का चुनाव करते समय जनता,राजनीतिक दल व विधायक दल अगड़ा-पिछड़ा का ध्यान नहीं रखते हुए किसी नेता की प्रतिभा,योग्यता,कार्य क्षमता,जनसेवा और ईमानदारी को आधार बनाएंगे।वैसे कुछ लोग यह भी कहते हैं कि थेसिस और एंटी थेसिस के बाद सिंथेसिस का समय एक दिन आएगा ही! तबतक के लिए हम तो कहेंगे.

" हमको मालूम है जन्नत की हकीक़त लेकिन
दिल को खुश रखने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है"

Sunday, October 31, 2010

ओबामा की भारत यात्रा बनाम अमेरिका का भविष्य


अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा 2008 में जब पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने तब मीडिया ने उन्हें किस्मत का धनी करार दिया। खुद ओबामा ने भी इस बात को स्वीकारा, लेकिन एक सच यह भी है कि ओबामा ने व्हाइट हाउस में जिस दिन कदम रखा था उसी दिन भाग्य उनका साथ छोड़ गया था। पूर्ववर्ती जॉर्ज डब्ल्यू बुश की सनक भरी नीतियों के परिणामस्वरूप इराक-अफगान युद्ध, आतंकवाद और चरमराई हुई अर्थव्यवस्था जैसी दुष्कर चुनौतियां ओबामा को विरासत में मिलीं। अमेरिकी उन्हें करिश्माई मानते हैं, इसलिए उम्मीदें का बोझ उनके कंधों पर कुछ ज्यादा ही है। ऐसा नहीं कि वह हर मोर्चे पर असफल ही रहे हैं, लेकिन आर्थिक बदहाली ने अमेरिकियों में कुछ ज्यादा ही असंतोष पैदा कर दिया है। इसमें शक नहीं कि ओबामा वादों को पूरा करने का दम रखते हैं। इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी उन्हीं के प्रयासों से हुई। बुश प्रशासन से तुलना करें तो ओबामा के निर्णय बेहतर साबित हुए हैं। रूस-अमेरिका के बीच मित्रता इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, लेकिन बेरोजगार होते अमेरिकी इंतजार नहीं करना चाहते हैं और ना ही उनमे और इंतज़ार करने का दम बचा है। वे बदलाव को विकल्प के रूप में देख रहे हैं। निश्चित रूप से घरेलू मोर्चे पर सफलता पाना आसान नहीं। ओबामा को एक बार फिर भाग्य का सहारा चाहिए। वह छह नवंबर को भारत दौरे पर आ रहे हैं। व्हाइट हाउस के रणनीतिकार भारत दौरे के जरिए अमेरिका में रोजगार सृजन करने के लिए प्रयासरत हैं। भाग्य का खेल देखिए कि अमेरिका में कांग्रेस चुनाव के मात्र चार दिन बाद ओबामा भारत आएंगे।पिछले कुछ दशकों की बात करें तो 80, 90 और 2000 के दशक में अब तक जितने भी कांग्रेस चुनाव हुए उनमें सत्ताधारी दल को जनता के रोष का सामना करना पड़ा। कांग्रेस चुनावों का प्रारूप अमेरिका में कांग्रेस चुनावों को मिड-टर्म इलेक्शन कहा जाता है।इधर कांग्रेस चुनाव (मिड-टर्म इलेक्शन) के प्रति पहले से आशंकित सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी 2012 में राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए बराक ओबामा के नाम पर एकमत नहीं है। हालांकि पार्टी के अधिकतर सदस्य उन्हें अगले राष्ट्रपति चुनावों में भी खड़ा होते नहीं देखना चाहते हैं, लेकिन उनके विरोधियों की संख्या अब पहले की तुलना में बहुत अधिक बढ़ गई है। अगर वह सफल होकर लौटे तो हो सकता है कि वह अमेरिकियों का खोया विश्वास फिर से पा सकें। दरअसल, अमेरिकी सिर्फ आर्थिक बदहाली के चलते ओबामा से नाराज हैं। ओबामा ने अब तक जितने भी एशियाई देशों की यात्रा की, उनमें सामरिक हितों पर अधिक ध्यान दिया, लेकिन भारत दौरे पर ओबामा के एजेंडे में आर्थिक हित सर्वोपरी हैं। विश्लेषक उनके बारे में जो कह रहे हैं-उसमें गलत कुछ भी नहीं। ओबामा जानते हैं कि अमेरिकी उनसे खफा हैं। यही कारण है कि कार्यकाल के शुरुआती दौर में वैश्विक मुद्दों पर ज्यादा ध्यान देने वाले ओबामा पिछले कई महीनों से घरेलू समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं। विश्लेषकों की राय में आर्थिक मंदी, बेरोजगारी, कटौती आदि को मतदाता बेहद खफा हैं। ओबामा ने अपने घर के समीप भीड़ को संबोधित करते हुए कहा, शिकागो, यह जिम्मा आपका है कि आप उन्हें बताएं कि हम कुछ भी नहीं भूले हैं। उनका संकेत पूर्ववर्ती जॉर्ज डब्ल्यू बुश प्रशासन के कार्यकाल में आई मंदी की ओर था। उन्होंने कहा कि चुनाव उन दो तरह की नीतियों के बीच चयन का विकल्प देते हैं, जिनमें एक तो समस्याएं उत्पन्न करती हैं और दूसरी नीतियां देश को सुनहरे भविष्य की ओर ले जाएंगी। पर वैश्विक पटल से ओबामा की दूरी को अंतरराष्ट्रीय मीडिया भलि-भांति जानता है। इससे साफ संकेत मिलता है कि ओबामा घर में पल रहे असंतोष से वाकिफ हैं और अब उन्होंने अमेरिकी अर्थव्यस्था को पटरी पर लाने के लिए कमर कस ली है। अमेरिका में आधारभूत ढांचे पर 50 अरब डॉलर खर्च करने की योजना और भारत यात्रा पर आर्थिक मुद्दे प्राथमिकता में होना इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। देखना यह है कि परिणाम कैसे आते हैं? क्योंकि इन्ही पर भविष्य के अमेरिका की दशा और दिशा तथा ओबामा का भविष्य निर्भर करेगा.

Monday, October 25, 2010

शरद यादव जी आपको हुआ क्या है?


अक्सर देखा यह गया है कि कुछ लोगों की प्रकृति या कहें प्रवृत्ति ऐसी होती है कि उन्हें अच्छाई में भी खोट नजर आने लगती है। किसी सही बात की तारीफ की उम्मीद तो इनसे करना बेकार है, ये तो उसमें भी मीन-मेख निकालने से नहीं चूकते। शायद ऐसी ही प्रवृत्ति जनता दल (यू) अध्यक्ष शरद यादव की भी होती जा रही है। आजकल वे बिना सोचे-समझे टिप्पणी कर देते हैं या कोई मुद्दा उठा देते हैं और बाद में उन्हें मुंह की खानी पड़ती है।
अपनी इसी प्रवृति का एक नया नमूना स्वनामधन्य श्री यादव ने कल पेश किया. शरद यादव ने सोमवार को फतुआ में एक चुनाव रैली को संबोधित करते हुए जेडी (यू) नेता और एनडीए संयोजक शरद यादव ने गांधी परिवार पर तीखे हमले किए। उन्होंने यह भी कहा कि राहुल को गंगा में फेंक देना चाहिए।

उन्होंने कहा, ' मोतीलाल, जवाहरलाल, इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी। अब एक नया बबुआ आ गया है। वह ऐसे करता है (भाषण शुरू करने से पहले आस्तीन चढा़ने की राहुल शैली की नकल उतारते हुए)। '
यादव ने कहा, ' तुमको मालूम क्या है ? कोई कागज पर लिख कर दे देता है और तुम पढ़ देते हो। तुम्हें तो उठाकर गंगा में फेंक देना चाहिए। लेकिन इस देश के लोग भी अजीब हैं.. यह देश बदकिस्मत है। '

दरअसल यादव राहुल की जनसभाओं में जुट रही भी़ड को देखकर बौखला गए है और इसी बौखलाहट में वह इस प्रकार की बातें बोल रहे हैं। उन्होंने राजनीतिक होशो हवास में यह बयान नहीं दिया है। श्री यादव सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष हैं, पर वे अभी भी अपने मुख्यमंत्री की तरह संयत नहीं है. लगता तो यह है की पार्टी में अपने घटते कद ने उनके व्यक्तित्व को भी बौना बना दिया है. शरद यादव ऊपर से बहुत घबराहट में हैं, लेकिन अंदर से मुस्कुरा रहे हैं. उन्होंने अपने अटपटे भाषण से राहुल और नीतीश दोनों पर निशाना साधा है. उन्होंने राहुल और उनके स्वतंत्रता सेनानी परिवार की कटु आलोचना करते हुए कहा है कि भाषण देते हुए अपने कुरते की आस्तीन चढ़ाने वाले राहुल को गंगा में फेंक देना चाहिए.
उनको जो बोलना था, वे पूरी चालाकी के साथ बोल गए लेकिन, इससे नीतीश के लिए चुनावी रास्ता कठिन हो गया, क्योंकि शरद ने चुनावी मुद्दा ही बदल दिया और जो मुद्दा बढ़ाया है, वह घनघोर आलोचनों का शिकार होगा ही. अब शरद यादव की पार्टी जदयू भाजपा के साथ है, जो आरएसएस की एक इकाई है और आरएसएस ने तो कभी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन तक नहीं किया, उलटे उसने उस अभिनव भारत का साथ दिया जिसके एक सदस्य ने महात्मा गाँधी की ह्त्या कर दी थी. इस प्रकार शरद यादव ने जदयू के एक तीर(छाप) से दो-दो निशाने साधे और नीतीश को बता दिया कि वे उसके सामने दादागिरी न दिखाया करें.
इधर नीतीश, जदयू को अपनी जागीर की तरह देखने लग गए हैं. शरद जी को चटनी समझने लग गए हैं, सो शरद जी ने उनको समाजवादी दांव दिखला दिया है.
चाहे कुछ भी हो, शरद जी को भाजपाई लोगों के साथ रहते-रहते स्वतंत्र सेनानिओं के खिलाफ बोलने की भाजपाई-बीमारी लग गई है. भाजपाई लोग महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, डा. राजेंद्र प्रसाद आदि की आलोचना किया करते थे, लेकिन वे मोती लाल नेहरू की आलोचना नहीं किया करते थे, परन्तु शरद जी ने मोती लाल नेहरू से लेकर राहुल गाँधी तक की आलोचना कर और व्यक्तिगत आक्षेप कर, एक नया रिकार्ड बना दिया है. लेकिन, यह रिकार्ड नीतीश का भी रिकार्ड ख़राब कर देगा. पर शरद जी को क्या गम कि नीतीश की सरकार बिहार में फिर बने न बने.....नीतीश को पार्टी पर हावी होने की सजा तो मिलनी ही चाहिए. सो उन्होंने सजा दे दी है और अपने चुनावी भाषण का स्वयं लाभ उठा गए हैं.
अगर नीतीश को पता होता की शरद जी ऐसा गुल खिलायेंगे तो, वे उनको भी नरेंद्र मोदी की श्रेणी में रख देते. वरुण गाँधी की श्रेणी में रख देते- कट्टर सांप्रदाइक श्रेणी में रख देते.

अपने को असली और श्रेष्ठ सेक्यूलर मानने वाले नीतीश जी का मानना है कि भाजपा घटाव नरेन्द्र मोदी, घटाव वरुण गाँधी, एक विशुद्ध सेक्यूलर पार्टी है और अगर लोहिया जी जीवित होते तो वे आरएसएस और भाजपा की दोहरी सदस्यता ले लेते. आचार्य नरेंद्र देव जीवित होते तो वे समाजवाद में भाजपा के योगदान पर नीतीश के चश्मे से एक कीताब लिख डालते और उसे बुकर पुरस्कार मिलता.

अभी कुछ दिनों पहले भी ऐसे ही प्रयास के तहत उन्होंने संसद में यह मांग कर डाली कि धारावाहिक `बालिका वधू' में बालविवाह को प्रोत्साहन दिया जा रहा है इसलिए इसे बंद किया जाना चाहिए। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने इसकी जांच करने का आश्वासन दिया। जांच में पाया गया की सीरियल के बारे में शरद यादव ने जो शिकायत की है वह सच नहीं है। सीरियल को सरकार ने क्लीन चिट दे दी और शरद यादव अपना सा मुंह लेकर रह गये। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब शरद यादव जी को अपने कथन पर झेंपना पड़ा हो। संसद पद के लिए महिलाओं की आरक्षित सीटों को बढ़ाने का प्रयास वर्षों से चल रहा है। राजनेता ही ये सीटें बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, इसके लिए ख्वाहिशमंद हैं और उनके बीच के ही कुछ लोग इसमें अडंगा डाल रहे हैं। इस बार जब महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने की बात उठी तो शरद यादव आपे से बाहर हो गये। वे तमतमा गये और भरी संसद में उन्होंने ललकारा -विधेयक पारित हुआ तो मैं फांसी लगा कर आत्महत्या कर लूंगा।' ऐसा एलान कर वे खुद तो हास्यास्पद बने ही अपनी पार्टी की भी रही सही इज्जत की लुटिया डुबो दी। शरद जी तपेतपाये नेता हैं। वर्षों से राजनीति में हैं। कहें तो राजनीति घोल कर पी गये हैं फिर उनसे ऐसी भयंकर भूल कैसे हो जाती है। संभव है कि यह उनका प्रचार पाने का कोई तरीका हो, क्योंकि ऐसे तो वे खबरों में कम ही आते हैं। इस तरह की गिमिक करते रहेंगे तो सुर्खियों में तो रहेंगे ही। अखबारों का भी क्या कहें उनकी आत्महत्या की हुंकार की खबर प्रमुखता से छपी। हालाँकि कोंग्रेस ने चुनाव आयोग से इस घटना पर संज्ञान लेते हुए शरद यादव पर कड़ी कारवाही की मांग की है पर मैं तो अभी भी यही मानती हूँ की "खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे". बेचारे शरद यादव क्या करेंगे. पहले उलटे बयान देंगे और फिर वापिस लेंगे. अब बेचारे गंभीर मुद्रा में सोच रहे हैं "ये क्या बोल गए शरद बाबू"

Monday, August 30, 2010

गर्भ रुदन

मैं अजन्मी
हूँ अंश तुम्हारा
फिर क्यों गैर बनाते हो
है मेरा क्या दोष
जो, ईश्वर की मर्जी झुठलाते हो
...
मै माँस-मज्जा का पिण्ड नहीं
दुर्गा, लक्ष्मी औ‘ भवानी हूँ
भावों के पुंज से रची
नित्य रचती सृजन कहानी हूँ

लड़की होना किसी पाप
की निशानी तो नहीं
फिर
मैं तो अभी अजन्मी हूँ
मत सहना मेरे लिए क्लेश
मत सहेजना मेरे लिए दहेज
मैं दिखा दूँगी
कि लड़कों से कमतर नहीं
माद्दा रखती हूँ
श्मशान घाट में भी अग्नि देने का

बस विनती मेरी है
मुझे दुनिया में आने तो दो!!

Thursday, July 29, 2010

स्त्री


क्या तुम जानते हो एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण ?

बता सकते हो तुम एक स्त्री को स्त्री द्रष्टि से देखते उसके स्त्रीत्व की परिभाषा ?

अगर नहीं तो फिर जानते क्या हो तुम रसोई और बिस्तर के गणित से परे

एक स्त्री के बारे में….?

जानने की कोशिश करो पर पहले तो बदलो अपनी दृष्टि को

एक पुरुष की जगह एक पुत्र, एक भाई एक पिता बनो

ओढ़ता,बिछाता,और भोगता शरीर को जीता पुरुष

शरीर के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता उसका प्यार-दुलार,मनुहार

सभी कुछ शरीर की परिधि से बंधा होता है…

लेकिन औरत, शरीर के बाहर भी बहुत कुछ होती है…

वह होती है जननी और सृष्टा मानव जाती की

वह होती है शक्ति दुर्गा, काली, लक्ष्मी, और सरस्वती

शक्ति का अपूर्व भंडार जो भरता है तुम्हारी रगों में

इसलिए जितना सताओगे उतना उठुगीं

जितना दबाओगे उतना उगुगीं

जितना बाँधोगे उतना बहूंगी

जितना बंद करोगे उतना गाऊँगी

जितना अपमान करोगे उतनी निडर हो जाउंगी

जितना सम्मान करोगे उतनी निखर जाउंगी

Thursday, July 8, 2010

दिल्ली की बारिश: डर लागे गरजे बदरिया

दिल्ली की बारिश मानो लौटरी, दिल्ली तक आते-आते बादलों का हाथ तंग हो जाता है, सो सोच समझ बरसते हैं। खैर दिल्ली में हर काम में सोचा जयादा जाता है, किया कम जाता है। चाहे वो नेता हों या जनता। बादलो को यह भाषा दिल्ली में घुसते ही समझ आ जाती है फिलहाल हाल तो हमेशा की तरह यही है की बारिश न हो तो समस्या और अगर हो जाए तो दिल्ली वालों की मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं।दिल्ली में मंगलवार सुबह हुई झमाझम बारिश ने दिल्ली वासियों से मुरझाये चेहरे पर खुशी की लहर ला दी. सुलगती गर्मी के आतंक से झुलसती दिल्ली ने बारिश की बुंदों से राहत की सांस ली है। सुबह हुई बारिश ने तापमान काफी कम कर दिया जिसके कारण मौसम बेहद सुहावना हो गया था. पर मंगलवार के बाद हालाँकि कल बुधवार को दिल्ली में हुई बारिश की मात्र कुछ खास नहीं मात्र २१.२ मिमी ही थी, पर इतनी ही बारिश दिल्ली की सिविक एजेंसियों की तैयारी को दिखने के लिए काफी था. दिल्लीवासियों के लिए यह एक भयावह मंजर था. मेरी एक घनिष्ठ मित्र जो की एक निजी बैंक में काम करती हैं उन्होंने बताया की जैसे ही उन्होंने डीएनडी फ्लायओवर का गेट पार किया और रिंग रोड पर पहुंची तो करीबन चार घंटे तक वह रिंग रोड पर ही फँसी रही. किसी तरह उन्होंने अपनी कार शांति पथ की तरफ मोड़ी तो उधर भी जाम. अंततः वह अपने घर नारायणा पहुंची पर करीब ६ घंटे के बाद. अन्य मार्गों पर ट्रेफिक रेंगता तो रहा पर सबसे बुरी हालत थी सेन्ट्रल, दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली की. धौला कुआँ पर ग्रेड विभाजक का एक हिस्सा तो पानी में ऐसा डूबा की उसे बंद करना पड़ा और उसका असर तुरंत दिखा शांति पथ, मोती बाग, अफ्रीका अवेन्यु मार्ग, सरदार पटेल मार्ग, रिज रोड, इन सबों पर ऐसा ट्रेफिक जाम हुआ की सेन्ट्रल दिल्ली से आने वाले ट्राफिक के लिए इन्हें बंद करना पड़ा. मंगलवार की बारिश के बाद राजधानी के कई अंडरपास और फ्लाई ओवरों के ढलानों पर भरा पानी बुधवार की दोपहर तक भी निकल नहीं पाया था। बुधवार दोपहर बाद हुई तेज बारिश से धौला कुआं अंडरपास लबालब हो गया, जिसकी वजह से आसपास के सभी रास्तों पर भारी जाम लग गया। आर.के. पुरम और मुनीरका तक गाड़ियों की कतारें लगी हुई थीं, तो दूसरी तरफ दिल्ली कैंट तक जाम था। वाहन चालकों ने तीन मूर्ति और ग्यारह मूर्ति का रुख किया, तो वहां भी कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया। स्विमिंग पूल बन चुके धौला कुआं अंडरपास के सामने ट्रैफिक पुलिसवाले बेबस नजर आए। ग्रीन पार्क से युसूफ सराय के बीच सड़क का एक बड़ा हिस्सा धंस जाने से अरबिंदो मार्ग जाम हो गया. हालात तो और ख़राब तब हो गए जब की कई ट्राफिक सिग्ननल बारिश और पॉवर कट की वजह से फेल हो गए और चौराहों और सड़कों पर बिलकुल अराजक स्थिति उत्पन्न हो गयी. एम् बी रोड पर एक भी सिग्नल काम नहीं कर रहा था. गाड़ियाँ रोंग साइड चल रही थी और एक एक क्रोसिंग पार करने में १५ से २० मिनट लग रहा था. सुनने में यह भी आया की आश्रम और सराय काले खान के बीच वी आइ पी मोवेमेंट की वजह से करीब आधे घंटे के लिए डी एन डी फ्लाय ओवर को बंद किया गया था पर उसकी वजह से जो जाम शुरू हुआ वह इंडिया गेट तक फ़ैल गया क्योंकि ये सारे इलाके थोड़ी देर के लिए ही सही ट्राफिक मोवेमेंट के लिए रोक दिए गए थे ताकि वी आइ पी को कोई अवरोध ना मिले. पर यह एक सच्चाई है की सिविक एजेन्सिएस यथा एमसीडी की गैर दूरंदेशी का नतीजा आखिरकार वही हुआ जिसकी आशंका थी। मॉनसून की पहली ही बारिश में एमसीडी के तमाम दावे धरे रह गए और जगह-जगह हुए जलभराव से लोगों को दिक्कतें हुईं। सोमवार को तो बंद की वजह से सड़कों पर ट्रैफिक बहुत कम था, इसलिए हालात सामान्य लग रहे थे, लेकिन मंगलवार सुबह राजधानी के कई इलाकों में हुई तेज बारिश के बाद जब लोग घरों से निकले, तो उन्हें जगह-जगह सड़क पर भरे पानी के बीच से गुजरना पड़ा। इस साल भी ट्रैफिक पुलिस ने मॉनसून से काफी पहले एमसीडी को आगाह कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद वैसा ही हुआ जैसा हर साल होता है। कई सड़कें स्विमिंग पूल में तब्दील हो गई और ट्रैफिक जाम के हालात बन गए। कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए चल रहे निर्माण कार्यों की वजह से पहले ही दिल्ली की सड़कों की हालत खस्ता है, ऐसे में मॉनसून की पहली बारिश से यह भी साफ हो गया कि आने वाले दिन और भी मुश्किल भरे हो सकते हैं।
सबसे ज्यादा जलभराव राजधानी के अंडरपास और फ्लाईओवरों के ढलानों पर हुआ। अशोक विहार के पास लॉरेंस रोड पर बने जिस नए-नवेले अंडरपास का दो दिन पहले ही धूमधाम से उद्घाटन किया गया था, उसमें मंगलवार को बारिश के बाद घुटने-घुटने तक पानी भर गया। पानी भर जाने की वजह से कई वाहन यहां से गुजरते वक्त खराब होकर बंद हो गए, जिन्हें धक्का लगाकर निकालना पड़ा। इसकी वजह से आसपास के रास्ते पर लंबा जाम लग गया। धौलाकुआं, द्वारका, मूलचंद, प्रेम बाड़ी और वजीरपुर इंडस्ट्रियल एरिया स्थित रेलवे अंडरपास का भी यही हाल हुआ। यहां भी जलभराव से ट्रैफिक पर असर पड़ा और जाम के हालात बने रहे।इसके अलावा शादीपुर, मोती बाग, पंजाबी बाग, कीर्ति नगर और जखीरा जैसे व्यस्त फ्लाईओवरों के ढलानों पर जलभराव की वजह से देर तक जाम लगा रहा। मायापुरी-रिंग रोड क्रॉसिंग, नारायणा टी पॉइंट, मोती नगर, कर्मपुरा, जीटी करनाल डिपो, जहांगीरपुरी कैरिज वे, ब्रिटानिया चौक और संसद विहार से पीतमपुरा पुलिस लाइन की तरफ जाने वाले रास्ते पर जलभराव से जाम के हालात बने रहे। वेस्ट पटेल नगर में बारिश से ठीक पहले केबल डालने के लिए सड़क खोदी गई थी, लेकिन बारिश के बाद उसमें पानी भर गया और मंगलवार को एक कार उसमें फंस गई। कार चालक बाल-बाल बचा। उधर, कनॉट प्लेस में भी बारिश के बाद बुरा हाल हो गया और दोपहर में यहां भी जाम लगा रहा। यहां चल रहे निर्माण कार्य की वजह से पहले ही पैदल चलना दूभर हो गया था, ऐसे में बारिश के बाद हालात और खराब हो गए। यहां जगह जगह पानी भर गया और कीचड़ जमा हो गया। ट्रैफिक पुलिस के मुताबिक , मंगलवार को ट्रैफिक हेल्पलाइन पर सुबह से शाम तक जलभराव की वजह से जाम लगने संबंधी 15 कॉल्स आईं , जबकि एमसीडी के सेंट्रल कंट्रोल रूम में जलभराव संबंधी 55 और पेड़ गिरने की 4 कॉल आईं। जलभराव की सबसे ज्यादा 13 कॉल्स रोहिणी जोन से आई , जबकि 11 कॉल्स साउथ जोन से आई। ट्रैफिक पुलिस का मानना है कि अगर एमसीडी के इंतजामों का यही हाल रहा , तो आने वाले दिन वाहन चालकों के लिए और भी मुश्किल भरे हो सकते हैं।
वास्तविकता तो यह है की राजधानी दिल्ली हर मानसून में भीगी बिल्ली बन बैठती है। यह प्रशासन को भी पता होता है कि मानसून में बारिश होगी और पानी भरेगा। इसकी तैयारियों के लिए ड्रेनेज सफाई के नाम पर पैसे भी पानी की तरह बहते हैं। पानी निकासी की परियोजनाएं ागजों पर पैसे की निकासी की जाती है। इंतजाम की पोल मानसून खोलता है। बरसाती नालों पर अवैध कब्जों से प्राकृतिक जल निकासी की व्यवस्था नहीं रही, कृत्रिम अव्यवस्था का अंजाम जनता भोगे।

प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो

आज काफी समय बाद थोडा चैन से बैठी हूँ . एक पुराना अखबार हाथ लगा और उसमे एक खबर थी मॉडल विवेका बालाजी की आत्महत्या की. खबर पढ़ते ही मुझे याद आ गई मधुर भंडारकर की रियल टाइम मूवी फैशन की और याद आया एक किरदार कंगना रानावत ने निभाया था. मॉडलिंग की दुनिया का वह नंगा सच जो मधुर ने दिखने की कोशिश की थी एक बार फिर नग्नता की पराकाष्ठा के साथ हमारी नजरों के सामने था. विवेका बाबजी की आत्महत्या के कारणों की बात जब भी उठती है, गौतम वोरा का नाम जरूर आता है। प्राय: सभी का मानना है कि अगर गौतम ने उसके साथ बेवफाई न की होती, तो वह आज जीवित ही नहीं, स्वस्थ-प्रसन्न होती। विवेका ने आत्महत्या की रात अपनी डायरी में लिखा था, यू किल्ड मी, गौतम। यह किसी ऐसे व्यक्ति की कराह लगती है जिसे अपने जीवन का सबसे बड़ा झटका लगा हो। इसीलिए सबकी सहानुभूति विवेका के साथ है। गौतम वोरा सबकी निगाह में खलनायक हो गया है। एक पत्रकार ने तो यहां तक लिख डाला कि विवेका की जान इसलिए गई कि उसने गलत आदमी का चुनाव किया था। गौतम वोरा के अलावा कोई और नहीं जानता न जान सकता है कि विवेका के साथ उसका रिश्ता क्या था? शायद विवेका भी नहीं जानती थी। अगर जानती होती, तो वह इतने विषाद में न पड़ती कि मृत्यु के चयन के अलावा उसे कोई और रास्ता न दिखाई पड़े। वैसे प्रेम में निराशा या बेवफाई का सदमा जरूरी नहीं कि आदमी को खुदकुशी की ओर ले जाए। आत्महत्या के मनोविज्ञान का अध्ययन करने वालों का कहना है कि कोई भी घटना सभी व्यक्तियों को एक ही तरह से प्रभावित नहीं करती। ऐसे भी लोग हैं जो मामूली-सी बात पर आत्महत्या कर लेते हैं। दूसरी तरफ, कुछ व्यक्तित्व इतने मजबूत होते हैं कि बड़ी-बड़ी घटनाओं को अपने ऊपर हावी होने नहीं देते। सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि दुनिया की आपकी समझ कैसी है। विवेका के अनेक मित्रों और परिचितों ने उसकी स्थिति और उसके मनोविज्ञान पर प्रकाश डालने की कोशिश की है। इनसे संकेत मिलता है कि उसका दुख किसी एक तरह का नहीं था। हो सकता है, बेवफाई के एहसास ने विवेका को उस बिंदु पर पहुंचा दिया हो जहां से लौट कर कोई वापस नहीं आता। गौतम से अपने संबंध को विवेका जिस तरह से समझ रही थी, जरूरी नहीं कि विवेका से अपने संबंध को गौतम भी उसी स्तर पर महसूस कर रहा होगा। कोई और आदमी यह भी ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि दोनों के बीच जो संबंध था, उसे प्रेम के नाम से परिभाषित करना तर्कसंगत होगा या नहीं। प्रेम भी सबके लिए एक ही अर्थ नहीं रखता। एक बार महात्मा गांधी ने कहा था कि धर्म उतने हो सकते हैं जितने लोग धरती पर रहते हैं। कारण, ईश्र्वर से सबका रिश्ता अपना-अपना होता है और नैतिकता की सबकी समझ भी अपनी-अपनी होती है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि प्रेम भी उतनी तरह का हो सकता है जितनी तरह के लोग धरती पर रहते हैं। इसलिए कोई दूसरे के प्रेम की तुलना अपने प्रेम से क्यों करे। नि:संदेह बेवफाई बुरी चीज है, लेकिन कोई बेवफाई करता क्यों है? इसे समझे बिना दोष निरूपण का तरीका न्यायसंगत नहीं हो सकता। जीवन के दूसरे संबंधों की तरह, प्रेम को भी हम एक स्थायी बंदोबस्त मानने के आदी हैं। जीवन में और खासकर संबंधों में कुछ भी स्थाई नहीं होता। स्थाई हो ही नहीं सकता, ऐसा नहीं है। ज्यादातर संबंध स्थाई ही होते हैं, खासकर जब वे विवाह में परिणत हो जाते हैं, लेकिन बिना विवाह के भी आखिरी सांस तक प्रेम के अनेक उदाहरण दिखाई पड़ते हैं। जब हम किसी संबंध में उतरते हैं, तो यह मानकर ही उतरते हैं कि यह अनंत भविष्य तक जारी रहेगा। हमारे यहां जनम-जनम के साथ की बात की जाती है, हालांकि अधिकांश युगल दिली तौर पर नहीं चाहते होंगे कि अगले जन्म में भी यही साथ मिले। संबंध अक्सर पुराने जूतों की तरह हो जाता है, जिनमें हमारे पैर आराम महसूस करते हैं। इसके बावजूद, जब जूते फट जाते हैं तो उन्हें बदलना ही पड़ता है। ईश्र्वर का लाख-लाख धन्यवाद कि उसने हमें पिछले जन्मों की स्मृतियों से वंचित कर रखा है। नहीं तो यह दुनिया नरक हो जाती। जब एक शरीर के विनाश के बाद आत्मा नए वस्त्र पहनती है और जीवन की एक नई इकाई के रूप में दुनिया में लौटती है, तो उसे नए संगी-साथी चाहिए होते हैं। इसी तरह, क्या एक ही जन्म में आदमी बार-बार मरता और फिर-फिर नहीं पैदा होता है? तो क्या आदमी को अपनी प्रतिश्रुति से बंधा नहीं होना चाहिए? अगर सभी लोग क्षण में जीना शुरू कर दें और आज के व्यवहार तथा कल के व्यवहार में कोई तारतम्य न रह जाए, तो इससे जो अराजकता पैदा होगी, उसे हममें से कौन सह सकता है? क्षण सत्य है, पर क्षणों का सिलसिला भी कम सत्य नहीं है। इसलिए परिवर्तन और निरंतरता, दोनों के मेल से ही जीवन में खुशबू आती है। जो वादे कानूनी तौर पर किए जाते हैं, उन्हें निभाना किसी भी आदमी का न्यूनतम कर्तव्य है। ऐसे वादों को कानून की शरण में जा कर ही तोड़ा जा सकता है। नहीं तो दुनिया चल नहीं सकती। इसके विपरीत, व्यक्तिगत स्तर पर किए गए वादे को उस क्षण का वादा समझकर चलने में ही भलाई है। जब कोई लड़की किसी लड़के से कहती है-आइ लव यू, तो यह उसकी उस क्षण की भावना है। और, किसी भी भावना को शाश्र्वत मानकर नहीं चला जा सकता। जब कोई जीवन किसी एक क्षण से बंध जाता है, तो वह जंजीर की फंसावट का शिकार हो जाता है। जीवन तभी तक मजेदार है, जब तक वह स्वतंत्र है। यह मान कर चलना ही सत्य के साथ तंदुरुस्त रिश्ता बनाना है।

Tuesday, July 6, 2010

छिछोरेपन की राजनीति

"हड़ताल विरोध जताने की एक कालविरुद्ध विधा है"

विपक्षी दलों द्वारा प्रायोजित राष्ट्रव्यापी बंद शायद अपने उद्देश्य में सफल रहा हो और शायद उसने बढती महंगाई पर जनता के आक्रोश को अपने पक्ष में भुनाने में आंशिक सफलता भी पायी हो किन्तु यह भी एक अटल सत्य है की जब भी आर्थिक परिस्थितियोंवश बढती महंगाई पर सरकार काबू पाने में सफल होने लगती है बस तभी एन डी ए नीत विपक्ष को जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी याद आने लगाती है. इस बार भी ऐसा ही कुछ करने की योजना बनायीं गयी और जिसका मूर्त रूप कल देखने को मिला. महंगाई के विरुद्ध विपक्ष का "भारत बंद" कितना सफल या कितना असफल रहा, यह राजनैतिक दलों के बीच विवाद का विषय जरूर हो सकता है , लेकिन आम जनता के लिए सफलता या असफलता उसे हुई दिक्कतों के पैमाने पर ही नापी जायेगी. जिन लोगों की ट्रेन या बस या फ्लाईट रद्द हो गयी या अपने शहर में ही जरूरी काम के लिए पहुँचाना नामुमकिन हो गया उन जैसे कई लोगों के लिए ऐसा बंद या उसकी सफलता या असफलता का कोई मायने नहीं होगा. वैसे लोग जो किसी न किसी प्रकार से अपने-अपने गंतव्य पर पहुँच गए और अपनी अपनी नौकरी की उनके लिए बंद किसी प्रकार सफल भी नहीं रहा होगा किन्तू वैसे लोग जिनकी आजीविका "रोज कुआँ खोदने और रोज पानी पीने" जैसे स्त्रोतों पर निर्भर है उनके लिए बंद किसी दुस्वप्न से कम नहीं है. बढती महंगाई चिंतनीय विषय है और उसपर विपक्ष का आवाज उठाना भी जनता को स्वीकार्य है किन्तु विरोध का ऐसा तरीका जिससे खुद जनता की ही परेशानियों में इजाफा हो कम से कम यह तो स्वीकार्य नहीं. देश के कई भागों में खासकर वहां जहाँ भाजपा या उसके सहयोगी दलों तथा वाम मोर्चे की सरकारे थी वहां सोमवार को आर्थिक गतिविधियाँ नगण्य रहीं हालाँकि राजधानी दिल्ली पर इसका कोई खास प्रभाव नहीं दिखा पर आर्थिक राजधानी मुंबई की रफ़्तार धीमी हो गयी थी. केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य तो बिलकुल ठप्प पड़ गए थे. हड़ताल से हुई आर्थिक क्षति का अंदाजा तो अभी बांकी है परन्तु यह काफी गंभीर होगा यह एक अटल सत्य है और इससे भी ज्यादा होगा जन्संपत्ति को हुई क्षति की क्षतिपूर्ति. और बढती महंगाई की आंच तले इस गंभीर नुक्सान की भरपाई कोढ़ में खाज जैसे तकलीफ दे रही है. बंद और हड़ताल आदि के प्रति जनता का रवैया हमेशा से पीछा छुड़ाने जैसा रहा है. अगर ऐसी घटनाओं के दिन जनता अपने घरों से बाहर नहीं निकलती तो मात्र शारीरिक हिंसा के भय से. जनता के मन में काफी क्षोभ है इस बात को लेकर की क्यों ऐसी पार्टियां आम आदमी के नाम से एक जबरदस्ती का चक्का जाम करती है जबकि नुक्सान उसी आम आदमी का होता है. भारत बंद को सफल-असफल बताने के दोनों पक्षों के दावे के बीच इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती कि आम जनता इस आयोजन में शामिल होने के लिए स्वेच्छा से आगे नहीं आई.क्या विपक्ष इस पर विचार करेगा कि एक ऐसे समय आम जनता उसके आयोजन में सहभागी क्यों नहीं बनी जब बढ़ती महंगाई उसे वास्तव में त्रस्त कर रही है? बल्कि बंद को सफल बनाने के लिए जो जतन किए गए उससे यही संदेश गूंजा कि महंगाई से त्रस्त जनता को विपक्ष ने और त्रस्त किया. जिस कैरोसीन को आम गरीब जनता का ईधन कहा जाता है और इसकी कीमत को लेकर राजनीति करने में एन डी ए शासित दो प्रमुख राज्य अग्रणी हैं. राष्ट्रव्यापी बंद का आह्वान करने में एनडीए आगे रहा है, लेकिन इसके दो राज्यों में केरोसिन पर आम आदमी से 10 फीसदी से ज्यादा का कर वसूला जा रहा है। पंजाब में अकाली दल व भाजपा की सरकार केरोसिन पर पांच फीसदी वैट के अलावा 10 फीसदी का अतिरिक्त कर वसूल रही है यानी 15 फीसदी का कर। दूसरे स्थान पर भाजपा और जनता दल (यू) वाली बिहार सरकार है। इसने तो केरोसिन पर 12.50 फीसदी का मूल्यव‌िर्द्धत कर (वैट) लगा रखा है. जिसे एक तरफ राजनीतिक दल गरीबों का उत्पाद बता रहे हैं उसे बाहर से ले लाने पर अतिरिक्त टैक्स लगा रहे हैं। अगर राजनीतिक दलों को वाकई गरीब जनता से इतना ख्याल होता तो वे अपने-अपने राज्यों में केरोसिन पर शुल्क कम कर सकते थे. इसके बाद बढ़ती कीमतों पर विपक्षी सोच की गंभीरता का अंदाजा अपने आप लग जाता है. दरअसल अनुभव यही रहा है की बंद की सफलता राजनैतिक ताकत से ज्यादा बाहुबल और उत्पात करने की क्षमता पर निर्भर होती है, अक्सर बंद तोड़फोड़ के दर से सफल होता है. दरअसल इन बंद और हड़ताल के प्रति जनता का व्यवहार एक सनक और तिरस्कार की तरह ही रहा है. जिस पेट्रोलियम पदार्थों की बढती कीमतों का बहाना लेकर इस बंद का आवाहन किया गया था यदि याद हो तो इसकी शुरुआत इनपर से सरकारी नियंत्रण हटाने को लेकर 1996 की वाममोर्चा समर्थित देवगौड़ा सरकार ने की थी और आज की एन डी ए उर्फ़ भाजपा ने ही इस बात का प्रस्ताव किया था की इन कीमतों को बाजार के ऊपर ही छोड़ देना चाहिए. दरअसल राजनीतिक पार्टियाँ इस संविधानिक एवं संसदीय तंत्र की हिस्सेदार हैं और यह उनकी भी जिम्मेदारी बनती है की वे जिस बात का विरोध कर रही है उसका विकल्प भी उनके पास मौजूद होना चाहिए वर्ना जनता का भरोसा कल की ही तरह उनपर से उठ जाएगा.

Monday, May 17, 2010

निरुपमा हमें माफ़ करना

आज कई दिनों के बाद मन काफी उदास सा लगता है. पिछली २९ अप्रैल से जब से निरुपमा पाठक की मृत्यु या यूँ कहें की हत्या का समाचार सुना तब से जाने मन में एक अजीब सी घिन घर कर गई है. लगता है शायद रिश्तों की कीमत नहीं रह गयी है. भावनाए शुन्य में विलीन हो गयी है. ग़ालिब की चंद पंक्तिया याद आ रही हैं.
"हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है"
शायद यही सोच रही होगी निरुपमा की आत्मा, अगर कहीं होगी तो, खुद को उसकी जगह रखकर देखती हूँ तो महसूस होता है. कैसी नारी छली जाती है अपनों के ही हाथों. निरुपमा केवल एक लड़की नहीं थी वो तो एक सोच थी. एक आम हिन्दुस्तानी लड़की की तरह जो अपने परिवार को बेहद प्यार करती थी. और प्यार करती थी उसको जिसके संग उसने जीवन बिताने के सपने देखे थे. एक आम लड़की की तरह अपने पिता के बेहद करीब और बहुत दुलारी. माँ की आँखों का तारा. भाइयों की लाडली. पर क्या सबने अपना कर्त्तव्य निभाया. वो तो अपने रिश्तों के प्रति इतनी वफादार निकली की अपने प्रेम को सामजिक मर्यादा दिलाने के लिए मात्र अपने गृहनगर चली गयी ताकि अपने जनकों की स्वनामधन्य मर्यादा को आंच ना आने दे. और उन्होंने क्या किया अपनी ही संतति को अपनी झूठी नाक की बलिवेदी पर चढ़ा दिया. और उसके भाई जिन्होंने रक्षासूत्र बांधकर उसकी रक्षा का प्रण लिया था स्वयं ही उसके भक्षक बन बैठे. आज पूरा चिटठाजगत दो फाड़ हो गया है कोई निरुपमा के जनकों को दोष दे रहा है तो कोई उसके प्रेमी को. पर कोई तो सोचे की निरुपमा क्या सोचती होगी. अरे सनातन धर्म के रखवालों किसी ने सनातन धर्मं का अर्थ भी समझा है. क्या किसी ने भी कभी ये सोचा की राम, कृष्ण इनके साथ कोई जातिसूचक शब्द नहीं लगा था. जिन राधा कृष्ण की पूजा करते हम अपना सर्वस्व न्योछावर करने की सोचते हैं. क्यों नहीं हम अपने बच्चों को उन राधा कृष्ण की तरह अपना जीवन बिताने की स्वतंत्रता देते हैं. निरुपमा ने तो सनातन धर्मं के अनुरूप आचरण ही किया. जब श्रीरामचंद्र जी ने धनुष भंग किया तो यह स्पष्ट था की उनका विवाह सीताजी से होगा पर फिर भी दोनों ने अपने अपने गुरुजनों की सहमती के हेतू उनकी और देखा. उनके पिता श्री दशरथ जी को तो बाद में समाचार मिला था ना की दशरथ जी ने राम जी का विवाह तय किया था. और अगर सनातन धर्मं की यही परंपरा है तो निरुपमा के गुरुजन भी उसके फैसले से तो परिचित थे. निरुपमा ने भी जिसे अपना मन समर्पित किया उसे ही अपना तन समर्पित किया. कोई गाँव की अनपढ़ गंवार तो थी नहीं वह. उसने अपने प्रेम की परिणति को अपनी संतति बनाने के हेतु उसका पालन करने का निश्चय किया. पर हाय रे माँ जिसकी कोख से निरुपमा जन्मी उसी को दया नहीं आई. न अपनी जाई पर न उसकी अजन्मी औलाद पर.
सोचने वाली बात है की एक बेटी ने अपने माँ बाप की मर्यादा का ख्याल तो रखा पर वो निर्मोही माँ बाप अपनी मर्यादा को खुद अपने पैरों के निचे रौंद गए. दरअसल कोई धर्मं नहीं कोई मर्यादा नहीं. बस फर्क सिर्फ इतना है की हमने अपने आप को जिन दीवारों में कैद कर रखा है उससे बाहर निकलने की कोशिश है विद्रोह और सजा है मौत. लगता तो यही है की स्त्री का कोई धर्म नहीं होता और धर्म ने उसके लिए सिर्फ बेड़ियां बनाईं हैं, और धर्म के ठेकेदार और पितृसत्ता के चौकीदार हाथ मे हाथ मिलाए सत्ता की सीढियाँ चढते हैं और मिल बाँट कर 'धर्म विमुख औरतों' को सबक सिखाते हैं, और....सब मंजूर, सब सही। पर हम कब तक पुरुषों से मुखातिब रहेंगे? क्या अब समय नहीं आया कि एक बार अपनी तरफ नजरें घुमाएं, अपने भीतर देखें। एक बार!
निरुपमा के लिए ऐसे हालात क्योंकर बने, लेकिन यह जानते हैं कि निश्चित रूप से उसका पालन इस भरोसे के साथ नही हुआ था कि माता- पिता उसके साथ हर मोड़ पर हैं।यह बड़ी बात है।कितनी लड़कियाँ हैं जो इस तरह से पाली-पोसी ही नही जातीं कि वे ऐसे नाज़ुक मोड़ पर फैसले ले सकें।आप और मैं भी शायद उम्र के इस मुकाम पर आकर समझ पा रहे हैं कि स्त्री के इर्द गिर्द बुना गया दुष्चक्र क्या है, क्यों है?
यह पुरुष से मुखातिब होना भर नही है कि हम धर्म के स्त्री के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल होने की बात कर रहे हैं , यह खुद अपनी डीलर्निंग के लिए बेहद ज़रूरी है कि हम स्त्रियाँ यह समझें कि किन बातों पर ईमोशनल नही होना है क्योंकि उनका अस्तित्व स्त्री को दबाने के लिए ही है।यह कहा जा सकता है कि ऊंची शिक्षा प्राप्त करने वाली लड़की भी वक्त पड़ने पर तार्किक तरीके से ,धर्म की बनाई वर्जनाओं और नियमों से मुक्त होकर फैसले नही ले पाती ।इसलिए बेहद ज़रूरी है कि अपने 'बनने'को वे समझें और उलटने का साहस जुटाएँ।यह तब तक नही होगा जब तक माता-पिता उनका पालन पोषण परायी अमानत या अपनी जागीर की तरह करते रहेंगे।इस नज़र से मै हमारी शिक्षा पद्धति मे भयंकर दोष मानती हूँ कि वह इस एक जेन्डर के मोर्चे पर अब भी नाकाम साबित हो रही है! पर एक प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है की क्या प्रियाभान्शु का कोई अपराध नहीं है. निरूपमा की मौत के बाद रह-रहकर एक सवाल मेरे जेहन में बार-बार आ रहा है कि इस देश में ऐसे न जाने कितने प्रियभांशु होंगे, जो अपने रिश्ते को एक नाम देने से घबराते हैं। महानगर में रहना, वहां का स्वतंत्र जीवन जीना और परिवार से दूर रहकर खुद के लक्ष्य के प्रति समर्पित रहना किसने अच्छा नहीं लगता। जरूर रहो, मजे में रहो, लेकिन उससे कई जिम्मेदारियां भी साथ जुड़ती चली जाती हैं। एक जिम्मेवारी ये रहती है कि आप जिससे रिश्ता रख रहे हैं, उस रिश्ते के प्रति आपमें कितना समर्पण है। जब निरूपमा को ये पता चला होगा कि उसके पेट में गर्भ है, तो क्या उसके दिल में ममता का ज्वार नहीं फूटा होगा? तब क्या उसने अपने अब तक के रिश्ते को एक कदम आगे बढ़कर विवाह जैसे संस्कार से जुड़ने की बात नहीं की होगी। मुझे प्रियभांशु के शोकाकुल चेहरे में कोई ऐसा दर्द नजर नहीं आता, जिसके लिए मैं उसके साथ न्याय के लिए आवाज बुलंद करूं। हां निरूपमा के हत्यारों को सजा देने की मांग जरूर करती हूं, लेकिन प्रियभांशु के साथ न्याय की गुहार लगानेवालों में कभी शामिल नहीं होउंगी । क्योंकि मुझे ऐसे में एक वैसे शख्स का साथ देने का गुनाह नजर आता है, जो अपनी जिम्मेवारियों से लगातार भागता रहा। उसने रिश्ते के नाम पर उस लकीर को पारकर लिया,जिसके बाद एक महिला तीसरे रिश्ते मातृत्व की ओर आगे बढ़ती है। अगर रास्ते में इतनी लंबी दूरी कर ली थी, तो प्रियभांशु से सवाल वही है कि रिश्ते को एक नाम देने में देरी क्यों की।
टीवी पर यह कहकर कि उसे निरुपमा के प्रेग्नेंट होने के बारे में कुछ भी पता नहीं था उसने न केवल अपने प्रेम को लांक्षित किया बल्कि अपनी मर चुकी प्रेमिका को भी कठघरे में खड़ा किया है। हम कैसे मान लें कि तीन महीने का गर्भ पालने का निर्णय उसका खुद का रहा होगा और उसने इसे इस बारे में कुछ नहीं बताया था। फिर वो कौन सी मजबूरी है जो इस तथाकथित भोले बालम को साहस के साथ सच को स्वीकारने का हौसला नहीं दे रही कि निरुपमा की कोख में उसके ही प्यार का अंश था।

निरूपमा की हत्या दो दिन बाद से ही प्रियाभंशु के खिलाफ तथाकथित शुचितावादी लोगों ने मोर्चा खोल दिया था। बिना उससे बात किये, उसका पक्ष जाने लोगों ने दोषी करार दे दिया। उसे एक खूबसूरत टैलेंटेड लड़की को अपनी प्रेमिका बनाकर दोस्तों के बीच रुआब गांठने वाली फितरत का कायर घोषित कर दिया। लेकिन प्रियभांशु मुझे तो लगता यही है की तुम भी जान बुझ कर उनका अनगढ़ सत्य स्वीकार कर उन लोगों को सही ठहराने पर उतारू हो। तुमने क्यों इतने विपरीत हालात में उसे अकेली मरने के लिए हत्यारों के बीच भेज दिया। उसके लगातार आ रहे एसएमएस ने तुम्हें कोई आभास नहीं दिया कि उसके साथ क्या कुछ हो सकता है। तुम उसकी मौत का बोझ कैसे उठाओगे ।

टीवी पर निरुपमा के भाई का चेहरा देखे तो उनकी आंखों में अब भी अपने परिवार की इज्जत बचा ले जाने का अभिमान साफ पढ़ा जा सकता है।। जिस बच्ची को पालपोस कर इतना बड़ा किया उसका दम घोंटते हुए हाथ उसकी मां के हों या उसके भाइयों या बाप के अब कोई फर्क नहीं पड़ता। निरुपमा हम तुम्हारी माफी के हकदार भी नहीं हैं। क्योंकि इस विकल्पहीन समय में हम अब भी तुम्हारे हत्यारों के साथ रहेंगे। स्थानीय पुलिस भी तुम्हारे इज्जतदार परिवार का ही साथ देगी शायद और तुम्हारी मौत का कोई निशाँ बाकी नहीं रह जाएगा लोगों के जेहन में। कोर्ट ने तुम्हारी मां को तीन दिन के लिए पैरोल पर छोड़ा है जानती हो क्यों! ताकि वो तुम्हारे अंतिम संस्कार में शामिल हो सके।

मतलब साफ़ है निरुपमा की मौत का गुनाहगार जितना उसके घर वाले है , उतना ही जनाब -प्रियभान्शु भी, जिसने निरुपमा के सामने ऐसी परिस्तिथियाँ खड़ी कि जिसकी वज़ह से उसकी मौत हुई ...बुद्धिजीवियों से अनुरोध है, उस परिवार का भी दर्द समझे जिससे निरुपमा ताल्लुकात रखती थी। ज़नाब आप लोगों कि भी बेटियां है, बहने हैं .....समझने की कोशिश करें संस्कार और संस्कृतियों को ठेंगा दिखा कर आप प्रगतिशील नहीं कहलायेंगे ।

कौन है जिम्मेदार?

कल दोपहर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर करीब २० मिनट तक मौत दौड़ती रही. शिकार भागते रहे बचने की कोशिश करते रहे. खुशकिस्मत थे जो बच गए पर जिनकी किस्मत साथ ना दे पाई उनमे से एक थी ३५ वर्षीया सोनी जो हाउस मेड का काम करती थी और साल में एक बार अपने परिवार से मिलने जा रही थी. पर इस भगदड़ ने उसे अंधी मौत के जबड़ों में धकेल दिया. सोनी जैसे कई और भी अभागे रहे. पर बेशर्मी तो देखिये, मौत की इस भगदड़ के बाद रेलवे भगदड़ का ठीकरा कभी यात्रियों तो कभी इत्तिफाक पर फोड़ रही है। हादसे के बाद नींद से जागी रेलवे ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर सुरक्षा-व्यवस्था दुरुस्त करने के दावे भी कर डाले। पर हादसे का शिकार हुए लोग रेलवे की बद इंतजामी को ही भगदड़ की वजह मानते हैं। मालूम हो कि इस हादसे में 40 से ज्यादा यात्री घायल हुए हैं। घायलों का लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में इलाज चल रहा है। घायलों में 7 लोगों की हालत अभी भी गंभीर बताई जा रही है।

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची मौत की भगदड़ का शिकार हुए लोग घटना के घंटों बाद भी सदमे से उभर नहीं पाए हैं। लेकिन रेलवे प्रशासन की बेशर्मी इतनी ज्यादा हो गई है की आँखों देखि मक्खी भी निगलने से उन्हें कोई गुरेज नहीं है. प्रशासन भगदड़ की बात से साफ इंकार कर रहा है। दूसरी तरफ हादसे में अपनों को खो चुके लोग कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। शोभा के जहन में रह रह कर वो खौफनाक मंजर घूम रहा है जिसने उसकी भाभी को छीन लिया। शोभा अपनी भाभी के साथ खुशी-खुशी अपने घर भागलपुर जा रही थी तभी अचानक प्लैटफार्म नंबर 12 पर लोगों का एक ऐसा सैलाब आया जिसके तले उसकी भाभी की सांसे थम गईं। वहीं हादसे के बाद रेल प्रशासन डैमेज कंट्रोल में लग गया। आनन-फानन में प्रेस कांफ्रेंस बुलाई और हादसे के बाद एतिहात के तौर पर उठाए जानेवाले कदमों का बखान किया। सोमवार से प्लैटफोर्म टिकट की बिक्री नहीं होगी। इस सबके बीच रेलवे का मानना है की भगदड़ तो यात्रियों के सीढी से गिरने के चलते हुई। प्लेटफोर्म बदलने का भगदड़ से कोई लेना देना नहीं।


फिर सवाल ये उठता है की क्या भगदड़ का शिकार हुए लोग झूठ बोल रहे हैं? हर रोज नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से करीबन 300 ट्रेने चलतीं हैं। जिनमें 7 लाख यात्री सफर करते हैं। सबसे बड़ा सवाल ये की आखिर ठीकरा यात्रियों के मत्थे फोड़ने के बजाए रेलवे इस घटना से सबक क्यों नहीं लेता? ज्ञातव्य हो की नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से छुटने वाली गाड़ियों की संख्या में से करीब १५० गाड़ियां पूरब की ओर जाती हैं जिन्हें नवनिर्मित आनंदविहार रेलवे स्टेशन पर शिफ्ट करने के लिए योजना बनायीं गई थी परन्तु रेलवे की लालफीताशाही की वजह से ना तो अब तक यह स्टेशन पूरी तरह कार्य कर पा रहा है और मात्र ७ ट्रेने परिचालित हो रही हैं जिनमे से मात्र २ रोजाना चलती हैं और शेष साप्ताहिक. अब खुद ही निर्णय करें की जिम्मेदारी किसकी है. निष्कर्ष तो यही निकाला जा रहा है की लोगों के सिर पर ठीकरा फोड़ने का निर्देश किसी और का नहीं बल्कि रेल मंत्री ममता बनर्जी की तरफ से दिया गया है। ममता ने लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने की बजाए हादसे का ठीकरा उन पर ही फोड़ दिया। जी हां, नगर निगम चुनावों में व्यस्त दिल्ली से दूर कोलकाता में बैठीं रेल मंत्री के मुताबिक यात्रियों को खुद पर काबू रखना चाहिए यानि भगदड़ रेलवे की नहीं लोगों की लापरवाही की वजह से मची।
रेल मंत्री का गैर-जिम्मेदाराना बयान .......!ऐसे हादसे होते रहते हैं..और इनको रोका नहीं सकता है....इसके लिए लोग ही जिम्मेदार हैं ! क्या बात है ...अगर यह हादसा किसी और रेल मंत्री के समय हो गया होता तो अब तक ममता बहन लाल-पीली हो कर चीखनेचिल्लाने लग जाती और जितनी भड़ास,गुस्सा निकालती वो हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं ...लेकिन खुद रेल मंत्री होने पर और ऐसे बयान दे कर वो अपना पल्ला झाड रही हैं.
मालूम हो कि जब रेलवे की मुखिया ही भगदड़ का ठीकरा आम आदमी के सिर फोड़ने पर आमादा हों तो बाकी अफसर तो उसी सुर में बात करेंगे। डीआरएम नई दिल्ली ने सबसे पहले चश्मदीदों के बयानों को झुठला दिया। उन यात्रियों की बात को गलत ठहरा दिया जो ट्रेन के प्लेटफॉर्म बदलने की सूचना के बाद मची भगदड़ का शिकार हुए। डीआरएम के मुताबिक ट्रेन के प्लेटफॉर्म में कोई बदलाव नहीं किया गया था।वहीं उत्तर रेलवे के प्रवक्ता ने तो प्लेटफॉर्म पर किसी भगदड़ की घटना से ही साफ इंकार कर दिया। प्लेटफॉर्म पर बिखरे जूते चप्पल भले भगदड़ की घटना की साफ गवाही दे रही हो लेकिन रेलवे अपने गैरजिम्मेदाराना रवैए को ढंकने में जुट गया है। हद तो और हो गयी की जब कोलकाता में बैठ छुट्टियाँ मना रही ममता जी की ममता जाने कौन से बिल में घुस गयी की उन्होंने मात्र टी० वी० पत्रकारों को एक बाईट देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली. पहले मौत का नजराना दिया अब मृतकों को २ लाख और घायलों को पचास हजार. क्या यही कीमत है इंसानी जान की. हद है संवेदनहीनता की.
भगदड़ की घटना पर पर्दा डालने और यात्रियों को ही जिम्मेदार ठहराने की कोशिश पर राजनीतिक दलों ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की है। पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने कहा है कि ममता बनर्जी को यात्रियों को ही जिम्मेदार ठहराने वाला बयान नहीं देना चाहिए था। वहीँ इस भगदड़ को देखते हुए और रेलवे की प्रतिक्रिया को देखते हुए स्विम यात्रियों ने उसी समय से प्लेटफोर्म न० १६ से जा रही ट्रेन में खुद ही कतार लगा कर प्रवेश किया.

इस हादसे के बाद एक बार फिर रेलवे के कामकाज को लेकर कई सवाल खड़े होने लगे हैं--



- प्लेटफॉर्म पर भगदड़ को छिपाने की कोशिश क्यों की गई?

- ज्यादा भीड़ से निपटने के लिए इंतजाम क्यों नहीं किए गए?

- भीड़ के बावजूद क्यों बदला गया प्लेटफॉर्म?

- क्या रेलवे की नजर में यात्रियों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं?

- क्या रेलवे पुलिस भी भगदड़ के लिए जिम्मेदार है?
किन्तु इन सबसे परे एक यह बात भी सोचने की है की हम भारतीय जो करुणा और दया के सागर माने जाते थे आज इतने संवेदनहीन हो गए हैं की अपनी संतति पर पाँव रखकर अपनी मंजिल की ओर बढ़ने में भी हमें कोई गुरेज नहीं है. ठीक है की प्लेटफार्म बदल दिए गए पर दोनों सटे हुए ही थे और शांति से इधर उधर जाया जा सकता था. दरअसल हम अनुशाशनहीन हो गए हैं. और उससे भी ज्यादा स्वार्थी हो गए हैं. सच्चाई तो यही है की आज जो हुआ वो आगे भी होगा तबतक जबतक की हममें से हर एक अपनी जिम्मेदारी को समझाना नहीं सीख जाता. और अगर समझ में ना आये तो उनसे पूछना जिनके अपने मौत के खूनी जबड़ों से भाग्यवश बच निकले.

Friday, May 14, 2010

आज की गीता

मैं गीता हूँ आज के युग की
क्यों कृष्ण के इन्तजार मैं बैठूं
मात्र भगवत मुख वाचन के लिए
अपने भाग्य पर इतराऊँ ऐठूँ
बीत गया वह समय जब
अर्जुन भीष्म का विपक्षी होता था
छाती पर वाण चलाने से पहले
शत्रु के पैर वह छूता था
मर्यादाये अब शेष हुई
न रहा सिद्धांत कोई बांकी
गांधी, नेहरु और शास्त्री के
वचनों की मात्र शेष रही झांकी
पांडव न बचा राजनीति मैं कोई
बस कौरव ही घुस आये हैं
शकुनी साथ था उनके
ये तो शकुनी के ही जाए हैं.
ध्रितराष्ट्र बनी सारी जनता
बस हाहाकार मचाती है
द्रौपदी का चीरहरण जब होता
मूक-बधिर हो जाती है
कुरुक्षेत्र की इस भूमि पर
अब शंखनाद मैं स्वयं करूंगी
चिरनिद्रा मैं सोये युवाओं के
प्राणों में स्वयं मैं ओज भरूँगी
न सोचो के बस वचनमात्र से
गीता के उपदेश सुनाऊँगी
जो वक्त पड़ा तो थाम गांडीव स्वयं
युद्धभूमि मैं भी उतर आऊँगी
मैं महाभारत के इस देश मैं
युगक्रांति लेकर आऊँगी

बचपन

काश के मैं बच्ची ही होती
न देखती जाति धर्मं मैं
न सामाजिक प्रतिष्ठा की बलि चढ़ती
जब दिल करता तब मैं हंसती
जब दिल दुखता मैं रो जाती
काश के मैं बच्ची ही होती.

न झेलती मैं छल- कपट
मात्र किसी के जीवन-यापन के लिए
न पाती दुर्व्यवहार किसी से
सिर्फ उसके पेट-पोषण के लिए
भूख लगे पर पी मात्रीक्षिर
उनके गोदी में सो जाती
उनके स्नेह की छाया पाती
काश के में बच्ची ही होती
न करती मैं आपाधापी
इस अर्थयुग की अंधी दौर में
मात्र सफल होने के लिए
न जाती उलटे छोर मैं
रिश्तों की स्नेहवर्षा में भीगकर
आनद का चरम पाती मैं
न दुखित होती मन ही मन
देख लुप्त होती मानवता का भाव

काश के सबका शैश्त्व न जाता
सुख शान्ति होती सबके द्वार पर
निश्चल निष्पापी बन रहते सब
खुश रहती यह सृष्टि भी
काश के मैं बच्ची ही होती.

आईना

खामोश व वीरान-सी आँखें
हिचकियों में टूटती सांसें
आसपास कुछ ढूँढती हैं
जाने क्या कुछ बूझती हैं
टटोलती हैं धरा पर
नंगे पैरों सरक सरक कर
छिलते घुटनों पर मंडराती मक्खियों
को हटाते भगाते
जमीन पर पड़े कंकरों पत्थरों से
खुद को बचाते बचाते.
पर हाथ में आता है
सिर्फ गोश्त का टुकड़ा
कोई इसे हिन्दू बताता
कोई मुस्लमान का कहता
कोई सांप्रदायिकता की संज्ञा देता
कोई धर्मनिरपेक्षता का राग अलापता
पर कोई तो बताओ उस दुधमुंहे मासूम का है क्या दोष
भूख से तड़पती आत्मा को तृप्त करने के लिए
माँ की छाती समझ वह लोथड़े को भी मुँह लगाता
और मुख में दूध की जगह खून भरा आता
सैकड़ों लाशों के बीच
मरे- अधमरों के संग
रक्त सना मुख लिए एक मासूम सा चेहरा
क्या वह इस देश का भविष्य है !!

जबान संभाल के

भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी भाषण करते-करते बहक गए और गाली-गलौच कर गए। गाली-गलौच भी किया तो किनसे खाली बैठे लालू और मुलायम सिंह यादव से। जिनके पास उनकी खुद की राजनीति के लिए मुद्दों का अकाल पड़ा हुआ है. अब गडकरी जी ने उन्हें अपनी एडियाँ ऊँची करने के लिए राजनीति की जमीन दे दी है पर शायद इन यादव द्वय को इतनी सी बात याद नहीं रही है की एडियाँ ऊँची करने से कद ऊँचा नहीं हो जाता है. दरअसल चंडीगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष ने लालू और मुलायमसिंह को जिन अलंकारिक शब्दों का प्रयोग किया, अगर वे तथा उनके गुर्गे भी ऐसे ही मधु भरे रसास्वादन शब्द आपको भी कह दे तो बताओ कैसे लगेगा? (वैसे मुलायम जी की और से मोहनसिंह जी ने अपना वाकतीर छोड़ दिया है) चले हैं राजनीति के बाजपेयी तथा राहुल बनने के लिए और इनके भाषण इतने निम्न स्तर के ! जोश में होश खो देना एक अच्छे लीडर शिप की पहिचान नहीं हो सकती है ! ऊंची कुर्सी वह भी देश की कभी नंबर वन कभी नंबर टू पार्टी ! मजे की बात तो यह है की यह वह पार्टी है जिसने भारतीय संस्कृति, सभ्यता, परम्पराओं, आचार-व्यवहार, भाषा का जिम्मा अपने कन्धों पर ले रखा है, उसका पार्टी अध्यक्ष ऐसे अशोभनीय और अपशब्दों का प्रयोग करता है, जिसको कहा गया, उनका कुछ भी नहीं बिगड़ा लेकिन नितिन गडकरी जी आपकी जवान गंदी हो गयी ! वे भले आपको माफ़ कर दें लेकिन देश की जनता आप को माफ़ नहीं करेगी ! अब तीर कमान से निकल गया है तो गडकरी जी की तो उनकी इस हरकत पर पार्टी और खुद गडकरी कह रहे हैं कि उन्होंने तो बस मुहावरे बोले हैं। अगर सचमुच उन्होंने ये मुहावरे ही कहे हैं तो बड़ी चिंता की बात है। उस स्कूल का पता लगाना चाहिए जहां हिन्दी के नाम पर ऐसे मुहावरे पढ़ाए जा रहे हैं। उस स्कूल को तत्काल बंद करवाया जाना चाहिए। उन्होंने चंडीगढ़ में पत्रकार सम्मेलन के दौरान क्या नए मुहावरे वोले आओ इसका विश्लेषण कर लेते हैं:-लालू यादव और मुलयम के बारे में उन्होंने कहा कि दोनों चापलूस हैं-ये कुत्ते की तरह कांग्रेस के तलवे चाट रहे हैं- -तलवे चाटना- मुहावरा है मगर कुत्ते की तरह तलवे चाटना उन्होंने जिस स्कूल में पढ़ा है, उस स्कूल को दंडित किया जाना चाहिए।
इस तरह एक अन्य वाक्य जिसे भी वह मुहावरा बता रहे हैं यह है कि -कांग्रेस में अगर कोई मर्द की औलाद है तो मेरे सवालों का जवाब दे-
माई का लाल मुहावरा है, मर्द की औलाद मुहावरा तो नहीं है, कम से कम हमने किसी स्कूल में नहीं पढ़ा। हां, मुंबइया फिल्मों में गाली की तरह जरूर इस्तेमाल होता है। यह इस्तेमाल तभी किया जाता है, जब मां की महिमा कम करनी हो या उसे गाली देनी हो। मां को गाली देने वाले मुहावरे वे कहां पढ़ कर आए हैं। ये सब मुहावरे किस स्कूल में पढ़ कर आए हैं यह उन्हें स्पष्ट करना चाहिए। कम से कम और बच्चों को यह सब सीखने से बचाया जा सके।
दरअसल मेरा मानना है की अब भाजपा भी अपनी सहयोगी पार्टी शिवसेना और उसकी संतति मनसे से राजनितिक जमीन बचाने के लिए उनकी ही जैसी गाली गलौज की भाषा का इस्तेमाल कर रही है. मुझे याद है की मैं अपने स्कूल और कोलेज के दिनों में भी खास तौर पर जब म० अटलजी के व्याख्यानों को सुनने के लिए अपने क्लास बंक किया करती थी. पुरे टाइम रेडिओ पर या टीवी पर कान गडाए बैठी रहती थी खासकर जब संसद में कोई प्रकार की बहस चल रही होती थी. अटलजी, सुष्माजी, प्रमोद महाजन जी, उमा भारती सरीखे वक्ता हुआ करते थे उस पार्टी में. पता नहीं विचारों का अकाल तो था ही अब संस्कारों का भी अकाल आ गया है भाजपा में. और गडकरी जी जैसे नेता का बचाव जोशीजी, लालजी टंडन जैसे प्रथम श्रेणी के नेता कर रहे हैं. मेरा मानना है की दरअसल गडकरी जी मुहावरों से छेड़छाड़ कर कुछ और कहना चाहते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं महाराष्ट्र में वाहवाही लूटने के लिए उनका मराठी मानुष जाग गया हो और उत्तर भारतीय नेताओं के लिए गाली अनजाने ही उनके मुहवरों से जुड़ गई हो। ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि वे आजकल महंगाई को लेकर प्रधानमंत्री से लगातार सवाल कर रहे हैं, पर ऐसा एक भी शब्द कृषिमंत्री शरद पवार के लिए नहीं बोल रहे। अपने इस मराठी भाई के लिए अभी तक ऐसा एक भी मुहावरा उनके मुंह से नहीं निकला।
भाई गडकरी जी अब आप राष्ट्रीय अध्यक्ष हो वो भी एक राष्ट्रीय पार्टी के । कम से कम मुहावरों की अपनी जानकारी ठीक करो। अगर आप किसी को गालियां देना ही चाहते हो तो दो, मगर उसका ठीकरा भाषा के सिर मत फोड़ो। इससे भाषा की बहुत किरकिरी और बदनामी होती, आपकी होती है पता नहीं, क्योंकि आप तो खुद अध्यक्ष हो। या कहीं ऐसा तो नहीं की स्वनामधन्य महारैली के चक्कर में जब आप बेहोश हुए तो कही इस चिलचिलाती गर्मी का असर अभी तक बाकी है. खैर हम तो यही कहेंगे भैया जबान सम्हाल के क्यों की होली का टाइम तो निकल गया वरना होली के बहाने शायद गडकरी जी बच गए होते यह कह कर की " बुरा न मानो होली है

Wednesday, May 5, 2010

कसाब का हिसाब

अजमल आमिर कसाब। है तो एक आतंकी का नाम लेकिन आज उसे बच्चा बच्चा जानता है। बचपन में सुना था कि या तो बहुत अच्छे बन जाओ या फिर बहुत बुरे। जो बहुत अच्छा काम करते हैं या तो वे याद रखे जाते हैं या फिर वो जो दुष्टता की हद पार कर जाते हैं वे जाने जाते हैं। बाकी बीच के लोगों को कोई नहीं जानता। आज वह बात सही सी लग रही है। कसाब को बच्चा बच्चा इसलिए जानता है कि उसे जघन्यता की सारी हदें पार कर दीं। बहुत संभव है कि इसमें मीडिया का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। अखबारों और टीवी में उसकी खबरें खूब प्रमुखता से छापी और दिखाई गईं। और जब लगातार तीन दिन तक मुंम्बई पर आतंकी साया रहा तब तो लाइव दिखाया गया। लगातार लाइव। अब २४ घंटे में कोई समय तो ऐसा आएगा ही जब बच्चा टीवी देखेगा कि कभी नहीं देखेगा। खैर यह मुद्दा नहीं है। मूल बात कुछ और ही है।
वही हुआ जिसकी उम्मीद थी और जो होना चाहिए था। अजमल आमिर कसाब को अदालत ने दोषी करार दे दिया है। यानी उसके ऊपर जो आरोप लगे वे सही हैं। अब बहस होगी कि उसे सजा क्या दी जाए। इस पर तरह तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। कोई कह रहा है कि उसे मौत की सजा दे कम कुछ नहीं मिलना चाहिए। कोई कह रहा है कि मौत की सजा से क्या होगा। उसे जिन्दा रख कर ऐसी सजा दी जाए जो वह याद रखे। अजमल तो खुद ही चाहता है कि उसे मार दिया जाए। कुछ लोगों को मत इससे हटकर है। उनका कहना है कि यह सब सजाएं तो किसी को भी मिल ही जाती हैं। पहले से चली आ रही हैं यानी परम्परागत सजाएं हैं। अजमल भारत के ऊपर अब तक के इतिहास में हुए सबसे बड़े हमले का आरोपी है। उसने 166 भारतीयों की जान ली है। इन 166 लोगों में विजय सालस्कर,हेमंत करकरे और अशोक काम्टे जैसे भारत के सपूतों को मार डाला हो। उसे कोई परम्परागत सजा कैसे मिल सकती है। इस जघन्य अपराध के लिए तो कोई नई सजा बनानी चाहिए, जिसे देख कर कोई भी कांप जाए और आतंक फैलाने वालों और उनका साथ देने वाले अपना काम करने से पहले सौ बार सोचें। अदालत को इसके लिए कुछ खास कदम उठाने चाहिए। उसी पिटी पिटाई लकीर पर चलकर कुछ नहीं होगा। इस तरह की परम्परागत सजा कितनों को मिली। कितनों को उम्रकैद दी गई और कितनों को फांसी की सजा दी गई। उससे क्या हुआ।
इन्हीं सब बातों के बीच एक सवाल मेरे जहन में भी कौंधा। सवाल यह कि अदालत ने अगर कसाब को दोषी माना है तो बहुत हद तक संभव है कि उसे उम्रकैद तो न ही हो। हो सकता है उसे फांसी की सजा दे दी जाए। लेकिन असल सवाल सही है कि क्या उसे फांसी पर लटकाया जा सकेगा। क्या अब तक आतंक फैलाने वालों को अदालत से फांसी की सजा दी गई उन्हें लटका दिया गया। क्या अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। यही भारतीय लोकतंत्र की कहें या किसी भी कहें विडम्बना है। वे सब अभी जिंदा हैं और शान से रह रहे हैं। यही नहीं जिस देश के खिलाफ उन्होंने षड्यंत्र रचा जिस देश के लोगों को उन्होंने माना उसी देश के लोगों की मेहनत की रोटी वे खा रहे हैं। उनके लिए सुरक्षाकर्मी भी तैनात किए गए हैं। बस यही सवाल मुझे परेशान कर रहा है। मैं खुद यह समझ नहीं पा रही हूं कि अजमल आमिर कसाब को क्या सजा मिलनी चाहिए। क्या उसे मौत दे देनी चाहिए या फिर जिंदा रखकर ऐसा सबक सिखाना चाहिए जो दूसरों के लिए नजीर बने। कुछ भी हो लेकिन मेरा खुद का मानना भी यही है कि कुछ तो खास इस बार होना चाहिए। हालांकि, इस बात पर संतोष जाहिर किया जा सकता है कि यह केस मात्र ५२१ दिन में ही पूरा हो गया और उसे दोषी करार दिया गया। शायद यही कारण है कि लोगों में न्यायपालिका के प्रति थोड़ा बहुत सम्मान अभी बचा है। अगर सजा का निर्धारण भी जल्द कर लिया जाए और उसका क्रियान्वयन भी द्रुत गति से हो तो शायद लोगों के मन में यह आए कि चलो कोई हो या न हो लेकिन न्यायपालिका अभी जिंदा है और उस पर भरोसा किया जा सकता है। परन्तु इस किस्से के कई और पहलु भी हैं उनमे से एक है देविका. दस साल की देविका को 17 महीने पहले दहशतगर्द अजमल आमिर कसाब ने बड़ा जख्म दिया था, लेकिन देविका ने भी बड़ी हिम्मत दिखाते हुए कसाब के मुकद्दमे में मील के पत्थर की भूमिका अदा की। अदालत में कसाब की पहचान का सिलसिला देविका के बयान से ही शुरू हुआ था। फिर एक बच्ची का हौसला देखकर मुंबई में इंसाफ पाने का ऐसा जज्बा जगा कि 653 लोग गवाही के लिए अदालत पहुंच गए। कई लोगों को मौत के घाट उतारने वाले कसाब की बंदूक से निकली एक गोली मुंबई के सीएसटी स्टेशन पर सुमेरपुर (पाली) की देविका के पैर में लगी थी।अदालत में बेशर्मी से मुस्कराने और पेशी पर लाने के दौरान पुलिसकर्मियों का मजाक उड़ाने वाला कसाब, देविका को देख पहली बार शर्मसार हुआ था, तब उसने कहा था ‘जज साहब मुझे फांसी दे दो’।मुंबई पर हमले वाले उस दिन देविका के परिवार को पुणे में रहने वाले बेटे भरतकुमार से मिलने जाना था। 14 वर्षीय बेटे जयेश और बेटी देविका के साथ, पिता नटवरलाल ट्रेन पकड़ने के लिए सीएसटी स्टेशन पर बैठे थे। अचानक भगदड़ मच गई। सामने दो युवक फायरिंग करते दिखे। लोगों को हताहत होते देख जयेश दूसरी तरफ भागा। देविका पिता के साथ वहीं खड़ी रही। कोई कुछ समझ पाता इससे पहले ही एक आतंकवादी ने देविका के दाहिने पैर में गोली मार दी। थोड़ी देर बाद देविका बेहोश हो गई’। अदालत की कार्रवाई के दौरान बच्ची को बार-बार वहां ले जाना आसान नहीं था। लेकिन सब चाहते थे कि आतंकवादी को उसके गुनाहों की सजा मिले। दूसरा पहलु हैं श्री वी डी जेंडे जिन्होंने कसाब और उसके दुसरे साथी अबू के हमलों के समय अपनी अनौंसर की ड्यूटी पर तैनात थे. अपने जीवन पर आये खतरे से न घबराते हुए अपनी ड्यूटी पर तैनात रहे और लोगों को पिछले निकास की ओर से निकल जाने के लिए लगातार अनाउंस करते रहे. तीसरे हैं छोटू शेख चायवाला जिसने सी एस टी टिकट काउंटर पर गोली लगने के बाद भी घायलों को ठेले पर लादकर अस्पताल पहुंचता रहा. चौथे हैं सेबेस्टियन डिसूजा मुंबई के एक छोटे दैनिक के फोटोग्राफर जो हमले के समय सीएसटी पर ही थे और उन्होंने कसाब और उसके साथी की तस्वीरे खेंची और पुलिस को बताया जिस वजह से उसे सजा मिली. फिर आते हैं चंद्रकांत टिके, कामा अस्पताल के सिक्योरिटी गार्ड जिन्होंने अपनी जान की परवाह ना करते हुए उन नौ लोगों का पता कसाब और उसके साथी को नहीं बताया और उनकी जान बचाई. अरुण जाधव मुंबई पुलिस कांस्टेबल जो शहीद कामते, सालसकर, और करकरे जैसों का जांबाज़ सहयोगी रहा और उस खौफनाक रात को उनके साथ उसी वाहन में थे. लाशों के बीच घायल होते हुए भी लाश की तरह पड़े रहे और मौका मिलते ही कंट्रोल रूम को इस घटना की जानकारी दी. इन सबके साहस और सूझबूझ ने आज किलिंग मशीन कसाब को उसका अंत दिखा दिया है. पर सबसे बड़ा श्री जाता है हमारे गृह मंत्री श्री पी चिदम्बरम को जिन्होंने नेपथ्य में रहकर भी अपने कानून के ज्ञान का पूरा उपयोग करते हुए कसाब के खिलाफ ऐसा डोजियर तैयार किया जिसकी काट ना तो पकिस्तान के पास थी और न ही उसके आकाओं के पास. सही में धन्यवाद के पात्र हैं चिदम्बरम साहेब. कसाब के खिलाफ फांसी का ऐसा फंदा तैयार किया है की आज न कल उसे इस पर लटकना ही पड़ेगा. इससे बचने के लिए चाहे वो बयां बदले या कुछ भी करे. इस कविहृदय के उदगार को ग्रहण करें.
दहशतगर्द कसाब को फांसी आई याद
अपने पूर्व बयान से मुकर गया जल्लाद
मुकर गया जल्लाद हुई ज्यों ही सुनवाई
बतलाता निर्दोष स्वयं को आज कसाई
दिव्यदृष्टि है ढीठ बहुत ये जालिम बंदा
अत: गले में जल्द डालिए इसके फंदा