Monday, May 17, 2010

निरुपमा हमें माफ़ करना

आज कई दिनों के बाद मन काफी उदास सा लगता है. पिछली २९ अप्रैल से जब से निरुपमा पाठक की मृत्यु या यूँ कहें की हत्या का समाचार सुना तब से जाने मन में एक अजीब सी घिन घर कर गई है. लगता है शायद रिश्तों की कीमत नहीं रह गयी है. भावनाए शुन्य में विलीन हो गयी है. ग़ालिब की चंद पंक्तिया याद आ रही हैं.
"हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है"
शायद यही सोच रही होगी निरुपमा की आत्मा, अगर कहीं होगी तो, खुद को उसकी जगह रखकर देखती हूँ तो महसूस होता है. कैसी नारी छली जाती है अपनों के ही हाथों. निरुपमा केवल एक लड़की नहीं थी वो तो एक सोच थी. एक आम हिन्दुस्तानी लड़की की तरह जो अपने परिवार को बेहद प्यार करती थी. और प्यार करती थी उसको जिसके संग उसने जीवन बिताने के सपने देखे थे. एक आम लड़की की तरह अपने पिता के बेहद करीब और बहुत दुलारी. माँ की आँखों का तारा. भाइयों की लाडली. पर क्या सबने अपना कर्त्तव्य निभाया. वो तो अपने रिश्तों के प्रति इतनी वफादार निकली की अपने प्रेम को सामजिक मर्यादा दिलाने के लिए मात्र अपने गृहनगर चली गयी ताकि अपने जनकों की स्वनामधन्य मर्यादा को आंच ना आने दे. और उन्होंने क्या किया अपनी ही संतति को अपनी झूठी नाक की बलिवेदी पर चढ़ा दिया. और उसके भाई जिन्होंने रक्षासूत्र बांधकर उसकी रक्षा का प्रण लिया था स्वयं ही उसके भक्षक बन बैठे. आज पूरा चिटठाजगत दो फाड़ हो गया है कोई निरुपमा के जनकों को दोष दे रहा है तो कोई उसके प्रेमी को. पर कोई तो सोचे की निरुपमा क्या सोचती होगी. अरे सनातन धर्म के रखवालों किसी ने सनातन धर्मं का अर्थ भी समझा है. क्या किसी ने भी कभी ये सोचा की राम, कृष्ण इनके साथ कोई जातिसूचक शब्द नहीं लगा था. जिन राधा कृष्ण की पूजा करते हम अपना सर्वस्व न्योछावर करने की सोचते हैं. क्यों नहीं हम अपने बच्चों को उन राधा कृष्ण की तरह अपना जीवन बिताने की स्वतंत्रता देते हैं. निरुपमा ने तो सनातन धर्मं के अनुरूप आचरण ही किया. जब श्रीरामचंद्र जी ने धनुष भंग किया तो यह स्पष्ट था की उनका विवाह सीताजी से होगा पर फिर भी दोनों ने अपने अपने गुरुजनों की सहमती के हेतू उनकी और देखा. उनके पिता श्री दशरथ जी को तो बाद में समाचार मिला था ना की दशरथ जी ने राम जी का विवाह तय किया था. और अगर सनातन धर्मं की यही परंपरा है तो निरुपमा के गुरुजन भी उसके फैसले से तो परिचित थे. निरुपमा ने भी जिसे अपना मन समर्पित किया उसे ही अपना तन समर्पित किया. कोई गाँव की अनपढ़ गंवार तो थी नहीं वह. उसने अपने प्रेम की परिणति को अपनी संतति बनाने के हेतु उसका पालन करने का निश्चय किया. पर हाय रे माँ जिसकी कोख से निरुपमा जन्मी उसी को दया नहीं आई. न अपनी जाई पर न उसकी अजन्मी औलाद पर.
सोचने वाली बात है की एक बेटी ने अपने माँ बाप की मर्यादा का ख्याल तो रखा पर वो निर्मोही माँ बाप अपनी मर्यादा को खुद अपने पैरों के निचे रौंद गए. दरअसल कोई धर्मं नहीं कोई मर्यादा नहीं. बस फर्क सिर्फ इतना है की हमने अपने आप को जिन दीवारों में कैद कर रखा है उससे बाहर निकलने की कोशिश है विद्रोह और सजा है मौत. लगता तो यही है की स्त्री का कोई धर्म नहीं होता और धर्म ने उसके लिए सिर्फ बेड़ियां बनाईं हैं, और धर्म के ठेकेदार और पितृसत्ता के चौकीदार हाथ मे हाथ मिलाए सत्ता की सीढियाँ चढते हैं और मिल बाँट कर 'धर्म विमुख औरतों' को सबक सिखाते हैं, और....सब मंजूर, सब सही। पर हम कब तक पुरुषों से मुखातिब रहेंगे? क्या अब समय नहीं आया कि एक बार अपनी तरफ नजरें घुमाएं, अपने भीतर देखें। एक बार!
निरुपमा के लिए ऐसे हालात क्योंकर बने, लेकिन यह जानते हैं कि निश्चित रूप से उसका पालन इस भरोसे के साथ नही हुआ था कि माता- पिता उसके साथ हर मोड़ पर हैं।यह बड़ी बात है।कितनी लड़कियाँ हैं जो इस तरह से पाली-पोसी ही नही जातीं कि वे ऐसे नाज़ुक मोड़ पर फैसले ले सकें।आप और मैं भी शायद उम्र के इस मुकाम पर आकर समझ पा रहे हैं कि स्त्री के इर्द गिर्द बुना गया दुष्चक्र क्या है, क्यों है?
यह पुरुष से मुखातिब होना भर नही है कि हम धर्म के स्त्री के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल होने की बात कर रहे हैं , यह खुद अपनी डीलर्निंग के लिए बेहद ज़रूरी है कि हम स्त्रियाँ यह समझें कि किन बातों पर ईमोशनल नही होना है क्योंकि उनका अस्तित्व स्त्री को दबाने के लिए ही है।यह कहा जा सकता है कि ऊंची शिक्षा प्राप्त करने वाली लड़की भी वक्त पड़ने पर तार्किक तरीके से ,धर्म की बनाई वर्जनाओं और नियमों से मुक्त होकर फैसले नही ले पाती ।इसलिए बेहद ज़रूरी है कि अपने 'बनने'को वे समझें और उलटने का साहस जुटाएँ।यह तब तक नही होगा जब तक माता-पिता उनका पालन पोषण परायी अमानत या अपनी जागीर की तरह करते रहेंगे।इस नज़र से मै हमारी शिक्षा पद्धति मे भयंकर दोष मानती हूँ कि वह इस एक जेन्डर के मोर्चे पर अब भी नाकाम साबित हो रही है! पर एक प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है की क्या प्रियाभान्शु का कोई अपराध नहीं है. निरूपमा की मौत के बाद रह-रहकर एक सवाल मेरे जेहन में बार-बार आ रहा है कि इस देश में ऐसे न जाने कितने प्रियभांशु होंगे, जो अपने रिश्ते को एक नाम देने से घबराते हैं। महानगर में रहना, वहां का स्वतंत्र जीवन जीना और परिवार से दूर रहकर खुद के लक्ष्य के प्रति समर्पित रहना किसने अच्छा नहीं लगता। जरूर रहो, मजे में रहो, लेकिन उससे कई जिम्मेदारियां भी साथ जुड़ती चली जाती हैं। एक जिम्मेवारी ये रहती है कि आप जिससे रिश्ता रख रहे हैं, उस रिश्ते के प्रति आपमें कितना समर्पण है। जब निरूपमा को ये पता चला होगा कि उसके पेट में गर्भ है, तो क्या उसके दिल में ममता का ज्वार नहीं फूटा होगा? तब क्या उसने अपने अब तक के रिश्ते को एक कदम आगे बढ़कर विवाह जैसे संस्कार से जुड़ने की बात नहीं की होगी। मुझे प्रियभांशु के शोकाकुल चेहरे में कोई ऐसा दर्द नजर नहीं आता, जिसके लिए मैं उसके साथ न्याय के लिए आवाज बुलंद करूं। हां निरूपमा के हत्यारों को सजा देने की मांग जरूर करती हूं, लेकिन प्रियभांशु के साथ न्याय की गुहार लगानेवालों में कभी शामिल नहीं होउंगी । क्योंकि मुझे ऐसे में एक वैसे शख्स का साथ देने का गुनाह नजर आता है, जो अपनी जिम्मेवारियों से लगातार भागता रहा। उसने रिश्ते के नाम पर उस लकीर को पारकर लिया,जिसके बाद एक महिला तीसरे रिश्ते मातृत्व की ओर आगे बढ़ती है। अगर रास्ते में इतनी लंबी दूरी कर ली थी, तो प्रियभांशु से सवाल वही है कि रिश्ते को एक नाम देने में देरी क्यों की।
टीवी पर यह कहकर कि उसे निरुपमा के प्रेग्नेंट होने के बारे में कुछ भी पता नहीं था उसने न केवल अपने प्रेम को लांक्षित किया बल्कि अपनी मर चुकी प्रेमिका को भी कठघरे में खड़ा किया है। हम कैसे मान लें कि तीन महीने का गर्भ पालने का निर्णय उसका खुद का रहा होगा और उसने इसे इस बारे में कुछ नहीं बताया था। फिर वो कौन सी मजबूरी है जो इस तथाकथित भोले बालम को साहस के साथ सच को स्वीकारने का हौसला नहीं दे रही कि निरुपमा की कोख में उसके ही प्यार का अंश था।

निरूपमा की हत्या दो दिन बाद से ही प्रियाभंशु के खिलाफ तथाकथित शुचितावादी लोगों ने मोर्चा खोल दिया था। बिना उससे बात किये, उसका पक्ष जाने लोगों ने दोषी करार दे दिया। उसे एक खूबसूरत टैलेंटेड लड़की को अपनी प्रेमिका बनाकर दोस्तों के बीच रुआब गांठने वाली फितरत का कायर घोषित कर दिया। लेकिन प्रियभांशु मुझे तो लगता यही है की तुम भी जान बुझ कर उनका अनगढ़ सत्य स्वीकार कर उन लोगों को सही ठहराने पर उतारू हो। तुमने क्यों इतने विपरीत हालात में उसे अकेली मरने के लिए हत्यारों के बीच भेज दिया। उसके लगातार आ रहे एसएमएस ने तुम्हें कोई आभास नहीं दिया कि उसके साथ क्या कुछ हो सकता है। तुम उसकी मौत का बोझ कैसे उठाओगे ।

टीवी पर निरुपमा के भाई का चेहरा देखे तो उनकी आंखों में अब भी अपने परिवार की इज्जत बचा ले जाने का अभिमान साफ पढ़ा जा सकता है।। जिस बच्ची को पालपोस कर इतना बड़ा किया उसका दम घोंटते हुए हाथ उसकी मां के हों या उसके भाइयों या बाप के अब कोई फर्क नहीं पड़ता। निरुपमा हम तुम्हारी माफी के हकदार भी नहीं हैं। क्योंकि इस विकल्पहीन समय में हम अब भी तुम्हारे हत्यारों के साथ रहेंगे। स्थानीय पुलिस भी तुम्हारे इज्जतदार परिवार का ही साथ देगी शायद और तुम्हारी मौत का कोई निशाँ बाकी नहीं रह जाएगा लोगों के जेहन में। कोर्ट ने तुम्हारी मां को तीन दिन के लिए पैरोल पर छोड़ा है जानती हो क्यों! ताकि वो तुम्हारे अंतिम संस्कार में शामिल हो सके।

मतलब साफ़ है निरुपमा की मौत का गुनाहगार जितना उसके घर वाले है , उतना ही जनाब -प्रियभान्शु भी, जिसने निरुपमा के सामने ऐसी परिस्तिथियाँ खड़ी कि जिसकी वज़ह से उसकी मौत हुई ...बुद्धिजीवियों से अनुरोध है, उस परिवार का भी दर्द समझे जिससे निरुपमा ताल्लुकात रखती थी। ज़नाब आप लोगों कि भी बेटियां है, बहने हैं .....समझने की कोशिश करें संस्कार और संस्कृतियों को ठेंगा दिखा कर आप प्रगतिशील नहीं कहलायेंगे ।

कौन है जिम्मेदार?

कल दोपहर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर करीब २० मिनट तक मौत दौड़ती रही. शिकार भागते रहे बचने की कोशिश करते रहे. खुशकिस्मत थे जो बच गए पर जिनकी किस्मत साथ ना दे पाई उनमे से एक थी ३५ वर्षीया सोनी जो हाउस मेड का काम करती थी और साल में एक बार अपने परिवार से मिलने जा रही थी. पर इस भगदड़ ने उसे अंधी मौत के जबड़ों में धकेल दिया. सोनी जैसे कई और भी अभागे रहे. पर बेशर्मी तो देखिये, मौत की इस भगदड़ के बाद रेलवे भगदड़ का ठीकरा कभी यात्रियों तो कभी इत्तिफाक पर फोड़ रही है। हादसे के बाद नींद से जागी रेलवे ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर सुरक्षा-व्यवस्था दुरुस्त करने के दावे भी कर डाले। पर हादसे का शिकार हुए लोग रेलवे की बद इंतजामी को ही भगदड़ की वजह मानते हैं। मालूम हो कि इस हादसे में 40 से ज्यादा यात्री घायल हुए हैं। घायलों का लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में इलाज चल रहा है। घायलों में 7 लोगों की हालत अभी भी गंभीर बताई जा रही है।

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मची मौत की भगदड़ का शिकार हुए लोग घटना के घंटों बाद भी सदमे से उभर नहीं पाए हैं। लेकिन रेलवे प्रशासन की बेशर्मी इतनी ज्यादा हो गई है की आँखों देखि मक्खी भी निगलने से उन्हें कोई गुरेज नहीं है. प्रशासन भगदड़ की बात से साफ इंकार कर रहा है। दूसरी तरफ हादसे में अपनों को खो चुके लोग कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। शोभा के जहन में रह रह कर वो खौफनाक मंजर घूम रहा है जिसने उसकी भाभी को छीन लिया। शोभा अपनी भाभी के साथ खुशी-खुशी अपने घर भागलपुर जा रही थी तभी अचानक प्लैटफार्म नंबर 12 पर लोगों का एक ऐसा सैलाब आया जिसके तले उसकी भाभी की सांसे थम गईं। वहीं हादसे के बाद रेल प्रशासन डैमेज कंट्रोल में लग गया। आनन-फानन में प्रेस कांफ्रेंस बुलाई और हादसे के बाद एतिहात के तौर पर उठाए जानेवाले कदमों का बखान किया। सोमवार से प्लैटफोर्म टिकट की बिक्री नहीं होगी। इस सबके बीच रेलवे का मानना है की भगदड़ तो यात्रियों के सीढी से गिरने के चलते हुई। प्लेटफोर्म बदलने का भगदड़ से कोई लेना देना नहीं।


फिर सवाल ये उठता है की क्या भगदड़ का शिकार हुए लोग झूठ बोल रहे हैं? हर रोज नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से करीबन 300 ट्रेने चलतीं हैं। जिनमें 7 लाख यात्री सफर करते हैं। सबसे बड़ा सवाल ये की आखिर ठीकरा यात्रियों के मत्थे फोड़ने के बजाए रेलवे इस घटना से सबक क्यों नहीं लेता? ज्ञातव्य हो की नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से छुटने वाली गाड़ियों की संख्या में से करीब १५० गाड़ियां पूरब की ओर जाती हैं जिन्हें नवनिर्मित आनंदविहार रेलवे स्टेशन पर शिफ्ट करने के लिए योजना बनायीं गई थी परन्तु रेलवे की लालफीताशाही की वजह से ना तो अब तक यह स्टेशन पूरी तरह कार्य कर पा रहा है और मात्र ७ ट्रेने परिचालित हो रही हैं जिनमे से मात्र २ रोजाना चलती हैं और शेष साप्ताहिक. अब खुद ही निर्णय करें की जिम्मेदारी किसकी है. निष्कर्ष तो यही निकाला जा रहा है की लोगों के सिर पर ठीकरा फोड़ने का निर्देश किसी और का नहीं बल्कि रेल मंत्री ममता बनर्जी की तरफ से दिया गया है। ममता ने लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने की बजाए हादसे का ठीकरा उन पर ही फोड़ दिया। जी हां, नगर निगम चुनावों में व्यस्त दिल्ली से दूर कोलकाता में बैठीं रेल मंत्री के मुताबिक यात्रियों को खुद पर काबू रखना चाहिए यानि भगदड़ रेलवे की नहीं लोगों की लापरवाही की वजह से मची।
रेल मंत्री का गैर-जिम्मेदाराना बयान .......!ऐसे हादसे होते रहते हैं..और इनको रोका नहीं सकता है....इसके लिए लोग ही जिम्मेदार हैं ! क्या बात है ...अगर यह हादसा किसी और रेल मंत्री के समय हो गया होता तो अब तक ममता बहन लाल-पीली हो कर चीखनेचिल्लाने लग जाती और जितनी भड़ास,गुस्सा निकालती वो हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं ...लेकिन खुद रेल मंत्री होने पर और ऐसे बयान दे कर वो अपना पल्ला झाड रही हैं.
मालूम हो कि जब रेलवे की मुखिया ही भगदड़ का ठीकरा आम आदमी के सिर फोड़ने पर आमादा हों तो बाकी अफसर तो उसी सुर में बात करेंगे। डीआरएम नई दिल्ली ने सबसे पहले चश्मदीदों के बयानों को झुठला दिया। उन यात्रियों की बात को गलत ठहरा दिया जो ट्रेन के प्लेटफॉर्म बदलने की सूचना के बाद मची भगदड़ का शिकार हुए। डीआरएम के मुताबिक ट्रेन के प्लेटफॉर्म में कोई बदलाव नहीं किया गया था।वहीं उत्तर रेलवे के प्रवक्ता ने तो प्लेटफॉर्म पर किसी भगदड़ की घटना से ही साफ इंकार कर दिया। प्लेटफॉर्म पर बिखरे जूते चप्पल भले भगदड़ की घटना की साफ गवाही दे रही हो लेकिन रेलवे अपने गैरजिम्मेदाराना रवैए को ढंकने में जुट गया है। हद तो और हो गयी की जब कोलकाता में बैठ छुट्टियाँ मना रही ममता जी की ममता जाने कौन से बिल में घुस गयी की उन्होंने मात्र टी० वी० पत्रकारों को एक बाईट देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली. पहले मौत का नजराना दिया अब मृतकों को २ लाख और घायलों को पचास हजार. क्या यही कीमत है इंसानी जान की. हद है संवेदनहीनता की.
भगदड़ की घटना पर पर्दा डालने और यात्रियों को ही जिम्मेदार ठहराने की कोशिश पर राजनीतिक दलों ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की है। पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने कहा है कि ममता बनर्जी को यात्रियों को ही जिम्मेदार ठहराने वाला बयान नहीं देना चाहिए था। वहीँ इस भगदड़ को देखते हुए और रेलवे की प्रतिक्रिया को देखते हुए स्विम यात्रियों ने उसी समय से प्लेटफोर्म न० १६ से जा रही ट्रेन में खुद ही कतार लगा कर प्रवेश किया.

इस हादसे के बाद एक बार फिर रेलवे के कामकाज को लेकर कई सवाल खड़े होने लगे हैं--



- प्लेटफॉर्म पर भगदड़ को छिपाने की कोशिश क्यों की गई?

- ज्यादा भीड़ से निपटने के लिए इंतजाम क्यों नहीं किए गए?

- भीड़ के बावजूद क्यों बदला गया प्लेटफॉर्म?

- क्या रेलवे की नजर में यात्रियों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं?

- क्या रेलवे पुलिस भी भगदड़ के लिए जिम्मेदार है?
किन्तु इन सबसे परे एक यह बात भी सोचने की है की हम भारतीय जो करुणा और दया के सागर माने जाते थे आज इतने संवेदनहीन हो गए हैं की अपनी संतति पर पाँव रखकर अपनी मंजिल की ओर बढ़ने में भी हमें कोई गुरेज नहीं है. ठीक है की प्लेटफार्म बदल दिए गए पर दोनों सटे हुए ही थे और शांति से इधर उधर जाया जा सकता था. दरअसल हम अनुशाशनहीन हो गए हैं. और उससे भी ज्यादा स्वार्थी हो गए हैं. सच्चाई तो यही है की आज जो हुआ वो आगे भी होगा तबतक जबतक की हममें से हर एक अपनी जिम्मेदारी को समझाना नहीं सीख जाता. और अगर समझ में ना आये तो उनसे पूछना जिनके अपने मौत के खूनी जबड़ों से भाग्यवश बच निकले.

Friday, May 14, 2010

आज की गीता

मैं गीता हूँ आज के युग की
क्यों कृष्ण के इन्तजार मैं बैठूं
मात्र भगवत मुख वाचन के लिए
अपने भाग्य पर इतराऊँ ऐठूँ
बीत गया वह समय जब
अर्जुन भीष्म का विपक्षी होता था
छाती पर वाण चलाने से पहले
शत्रु के पैर वह छूता था
मर्यादाये अब शेष हुई
न रहा सिद्धांत कोई बांकी
गांधी, नेहरु और शास्त्री के
वचनों की मात्र शेष रही झांकी
पांडव न बचा राजनीति मैं कोई
बस कौरव ही घुस आये हैं
शकुनी साथ था उनके
ये तो शकुनी के ही जाए हैं.
ध्रितराष्ट्र बनी सारी जनता
बस हाहाकार मचाती है
द्रौपदी का चीरहरण जब होता
मूक-बधिर हो जाती है
कुरुक्षेत्र की इस भूमि पर
अब शंखनाद मैं स्वयं करूंगी
चिरनिद्रा मैं सोये युवाओं के
प्राणों में स्वयं मैं ओज भरूँगी
न सोचो के बस वचनमात्र से
गीता के उपदेश सुनाऊँगी
जो वक्त पड़ा तो थाम गांडीव स्वयं
युद्धभूमि मैं भी उतर आऊँगी
मैं महाभारत के इस देश मैं
युगक्रांति लेकर आऊँगी

बचपन

काश के मैं बच्ची ही होती
न देखती जाति धर्मं मैं
न सामाजिक प्रतिष्ठा की बलि चढ़ती
जब दिल करता तब मैं हंसती
जब दिल दुखता मैं रो जाती
काश के मैं बच्ची ही होती.

न झेलती मैं छल- कपट
मात्र किसी के जीवन-यापन के लिए
न पाती दुर्व्यवहार किसी से
सिर्फ उसके पेट-पोषण के लिए
भूख लगे पर पी मात्रीक्षिर
उनके गोदी में सो जाती
उनके स्नेह की छाया पाती
काश के में बच्ची ही होती
न करती मैं आपाधापी
इस अर्थयुग की अंधी दौर में
मात्र सफल होने के लिए
न जाती उलटे छोर मैं
रिश्तों की स्नेहवर्षा में भीगकर
आनद का चरम पाती मैं
न दुखित होती मन ही मन
देख लुप्त होती मानवता का भाव

काश के सबका शैश्त्व न जाता
सुख शान्ति होती सबके द्वार पर
निश्चल निष्पापी बन रहते सब
खुश रहती यह सृष्टि भी
काश के मैं बच्ची ही होती.

आईना

खामोश व वीरान-सी आँखें
हिचकियों में टूटती सांसें
आसपास कुछ ढूँढती हैं
जाने क्या कुछ बूझती हैं
टटोलती हैं धरा पर
नंगे पैरों सरक सरक कर
छिलते घुटनों पर मंडराती मक्खियों
को हटाते भगाते
जमीन पर पड़े कंकरों पत्थरों से
खुद को बचाते बचाते.
पर हाथ में आता है
सिर्फ गोश्त का टुकड़ा
कोई इसे हिन्दू बताता
कोई मुस्लमान का कहता
कोई सांप्रदायिकता की संज्ञा देता
कोई धर्मनिरपेक्षता का राग अलापता
पर कोई तो बताओ उस दुधमुंहे मासूम का है क्या दोष
भूख से तड़पती आत्मा को तृप्त करने के लिए
माँ की छाती समझ वह लोथड़े को भी मुँह लगाता
और मुख में दूध की जगह खून भरा आता
सैकड़ों लाशों के बीच
मरे- अधमरों के संग
रक्त सना मुख लिए एक मासूम सा चेहरा
क्या वह इस देश का भविष्य है !!

जबान संभाल के

भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी भाषण करते-करते बहक गए और गाली-गलौच कर गए। गाली-गलौच भी किया तो किनसे खाली बैठे लालू और मुलायम सिंह यादव से। जिनके पास उनकी खुद की राजनीति के लिए मुद्दों का अकाल पड़ा हुआ है. अब गडकरी जी ने उन्हें अपनी एडियाँ ऊँची करने के लिए राजनीति की जमीन दे दी है पर शायद इन यादव द्वय को इतनी सी बात याद नहीं रही है की एडियाँ ऊँची करने से कद ऊँचा नहीं हो जाता है. दरअसल चंडीगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष ने लालू और मुलायमसिंह को जिन अलंकारिक शब्दों का प्रयोग किया, अगर वे तथा उनके गुर्गे भी ऐसे ही मधु भरे रसास्वादन शब्द आपको भी कह दे तो बताओ कैसे लगेगा? (वैसे मुलायम जी की और से मोहनसिंह जी ने अपना वाकतीर छोड़ दिया है) चले हैं राजनीति के बाजपेयी तथा राहुल बनने के लिए और इनके भाषण इतने निम्न स्तर के ! जोश में होश खो देना एक अच्छे लीडर शिप की पहिचान नहीं हो सकती है ! ऊंची कुर्सी वह भी देश की कभी नंबर वन कभी नंबर टू पार्टी ! मजे की बात तो यह है की यह वह पार्टी है जिसने भारतीय संस्कृति, सभ्यता, परम्पराओं, आचार-व्यवहार, भाषा का जिम्मा अपने कन्धों पर ले रखा है, उसका पार्टी अध्यक्ष ऐसे अशोभनीय और अपशब्दों का प्रयोग करता है, जिसको कहा गया, उनका कुछ भी नहीं बिगड़ा लेकिन नितिन गडकरी जी आपकी जवान गंदी हो गयी ! वे भले आपको माफ़ कर दें लेकिन देश की जनता आप को माफ़ नहीं करेगी ! अब तीर कमान से निकल गया है तो गडकरी जी की तो उनकी इस हरकत पर पार्टी और खुद गडकरी कह रहे हैं कि उन्होंने तो बस मुहावरे बोले हैं। अगर सचमुच उन्होंने ये मुहावरे ही कहे हैं तो बड़ी चिंता की बात है। उस स्कूल का पता लगाना चाहिए जहां हिन्दी के नाम पर ऐसे मुहावरे पढ़ाए जा रहे हैं। उस स्कूल को तत्काल बंद करवाया जाना चाहिए। उन्होंने चंडीगढ़ में पत्रकार सम्मेलन के दौरान क्या नए मुहावरे वोले आओ इसका विश्लेषण कर लेते हैं:-लालू यादव और मुलयम के बारे में उन्होंने कहा कि दोनों चापलूस हैं-ये कुत्ते की तरह कांग्रेस के तलवे चाट रहे हैं- -तलवे चाटना- मुहावरा है मगर कुत्ते की तरह तलवे चाटना उन्होंने जिस स्कूल में पढ़ा है, उस स्कूल को दंडित किया जाना चाहिए।
इस तरह एक अन्य वाक्य जिसे भी वह मुहावरा बता रहे हैं यह है कि -कांग्रेस में अगर कोई मर्द की औलाद है तो मेरे सवालों का जवाब दे-
माई का लाल मुहावरा है, मर्द की औलाद मुहावरा तो नहीं है, कम से कम हमने किसी स्कूल में नहीं पढ़ा। हां, मुंबइया फिल्मों में गाली की तरह जरूर इस्तेमाल होता है। यह इस्तेमाल तभी किया जाता है, जब मां की महिमा कम करनी हो या उसे गाली देनी हो। मां को गाली देने वाले मुहावरे वे कहां पढ़ कर आए हैं। ये सब मुहावरे किस स्कूल में पढ़ कर आए हैं यह उन्हें स्पष्ट करना चाहिए। कम से कम और बच्चों को यह सब सीखने से बचाया जा सके।
दरअसल मेरा मानना है की अब भाजपा भी अपनी सहयोगी पार्टी शिवसेना और उसकी संतति मनसे से राजनितिक जमीन बचाने के लिए उनकी ही जैसी गाली गलौज की भाषा का इस्तेमाल कर रही है. मुझे याद है की मैं अपने स्कूल और कोलेज के दिनों में भी खास तौर पर जब म० अटलजी के व्याख्यानों को सुनने के लिए अपने क्लास बंक किया करती थी. पुरे टाइम रेडिओ पर या टीवी पर कान गडाए बैठी रहती थी खासकर जब संसद में कोई प्रकार की बहस चल रही होती थी. अटलजी, सुष्माजी, प्रमोद महाजन जी, उमा भारती सरीखे वक्ता हुआ करते थे उस पार्टी में. पता नहीं विचारों का अकाल तो था ही अब संस्कारों का भी अकाल आ गया है भाजपा में. और गडकरी जी जैसे नेता का बचाव जोशीजी, लालजी टंडन जैसे प्रथम श्रेणी के नेता कर रहे हैं. मेरा मानना है की दरअसल गडकरी जी मुहावरों से छेड़छाड़ कर कुछ और कहना चाहते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं महाराष्ट्र में वाहवाही लूटने के लिए उनका मराठी मानुष जाग गया हो और उत्तर भारतीय नेताओं के लिए गाली अनजाने ही उनके मुहवरों से जुड़ गई हो। ऐसा इसलिए भी लगता है क्योंकि वे आजकल महंगाई को लेकर प्रधानमंत्री से लगातार सवाल कर रहे हैं, पर ऐसा एक भी शब्द कृषिमंत्री शरद पवार के लिए नहीं बोल रहे। अपने इस मराठी भाई के लिए अभी तक ऐसा एक भी मुहावरा उनके मुंह से नहीं निकला।
भाई गडकरी जी अब आप राष्ट्रीय अध्यक्ष हो वो भी एक राष्ट्रीय पार्टी के । कम से कम मुहावरों की अपनी जानकारी ठीक करो। अगर आप किसी को गालियां देना ही चाहते हो तो दो, मगर उसका ठीकरा भाषा के सिर मत फोड़ो। इससे भाषा की बहुत किरकिरी और बदनामी होती, आपकी होती है पता नहीं, क्योंकि आप तो खुद अध्यक्ष हो। या कहीं ऐसा तो नहीं की स्वनामधन्य महारैली के चक्कर में जब आप बेहोश हुए तो कही इस चिलचिलाती गर्मी का असर अभी तक बाकी है. खैर हम तो यही कहेंगे भैया जबान सम्हाल के क्यों की होली का टाइम तो निकल गया वरना होली के बहाने शायद गडकरी जी बच गए होते यह कह कर की " बुरा न मानो होली है

Wednesday, May 5, 2010

कसाब का हिसाब

अजमल आमिर कसाब। है तो एक आतंकी का नाम लेकिन आज उसे बच्चा बच्चा जानता है। बचपन में सुना था कि या तो बहुत अच्छे बन जाओ या फिर बहुत बुरे। जो बहुत अच्छा काम करते हैं या तो वे याद रखे जाते हैं या फिर वो जो दुष्टता की हद पार कर जाते हैं वे जाने जाते हैं। बाकी बीच के लोगों को कोई नहीं जानता। आज वह बात सही सी लग रही है। कसाब को बच्चा बच्चा इसलिए जानता है कि उसे जघन्यता की सारी हदें पार कर दीं। बहुत संभव है कि इसमें मीडिया का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। अखबारों और टीवी में उसकी खबरें खूब प्रमुखता से छापी और दिखाई गईं। और जब लगातार तीन दिन तक मुंम्बई पर आतंकी साया रहा तब तो लाइव दिखाया गया। लगातार लाइव। अब २४ घंटे में कोई समय तो ऐसा आएगा ही जब बच्चा टीवी देखेगा कि कभी नहीं देखेगा। खैर यह मुद्दा नहीं है। मूल बात कुछ और ही है।
वही हुआ जिसकी उम्मीद थी और जो होना चाहिए था। अजमल आमिर कसाब को अदालत ने दोषी करार दे दिया है। यानी उसके ऊपर जो आरोप लगे वे सही हैं। अब बहस होगी कि उसे सजा क्या दी जाए। इस पर तरह तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। कोई कह रहा है कि उसे मौत की सजा दे कम कुछ नहीं मिलना चाहिए। कोई कह रहा है कि मौत की सजा से क्या होगा। उसे जिन्दा रख कर ऐसी सजा दी जाए जो वह याद रखे। अजमल तो खुद ही चाहता है कि उसे मार दिया जाए। कुछ लोगों को मत इससे हटकर है। उनका कहना है कि यह सब सजाएं तो किसी को भी मिल ही जाती हैं। पहले से चली आ रही हैं यानी परम्परागत सजाएं हैं। अजमल भारत के ऊपर अब तक के इतिहास में हुए सबसे बड़े हमले का आरोपी है। उसने 166 भारतीयों की जान ली है। इन 166 लोगों में विजय सालस्कर,हेमंत करकरे और अशोक काम्टे जैसे भारत के सपूतों को मार डाला हो। उसे कोई परम्परागत सजा कैसे मिल सकती है। इस जघन्य अपराध के लिए तो कोई नई सजा बनानी चाहिए, जिसे देख कर कोई भी कांप जाए और आतंक फैलाने वालों और उनका साथ देने वाले अपना काम करने से पहले सौ बार सोचें। अदालत को इसके लिए कुछ खास कदम उठाने चाहिए। उसी पिटी पिटाई लकीर पर चलकर कुछ नहीं होगा। इस तरह की परम्परागत सजा कितनों को मिली। कितनों को उम्रकैद दी गई और कितनों को फांसी की सजा दी गई। उससे क्या हुआ।
इन्हीं सब बातों के बीच एक सवाल मेरे जहन में भी कौंधा। सवाल यह कि अदालत ने अगर कसाब को दोषी माना है तो बहुत हद तक संभव है कि उसे उम्रकैद तो न ही हो। हो सकता है उसे फांसी की सजा दे दी जाए। लेकिन असल सवाल सही है कि क्या उसे फांसी पर लटकाया जा सकेगा। क्या अब तक आतंक फैलाने वालों को अदालत से फांसी की सजा दी गई उन्हें लटका दिया गया। क्या अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। यही भारतीय लोकतंत्र की कहें या किसी भी कहें विडम्बना है। वे सब अभी जिंदा हैं और शान से रह रहे हैं। यही नहीं जिस देश के खिलाफ उन्होंने षड्यंत्र रचा जिस देश के लोगों को उन्होंने माना उसी देश के लोगों की मेहनत की रोटी वे खा रहे हैं। उनके लिए सुरक्षाकर्मी भी तैनात किए गए हैं। बस यही सवाल मुझे परेशान कर रहा है। मैं खुद यह समझ नहीं पा रही हूं कि अजमल आमिर कसाब को क्या सजा मिलनी चाहिए। क्या उसे मौत दे देनी चाहिए या फिर जिंदा रखकर ऐसा सबक सिखाना चाहिए जो दूसरों के लिए नजीर बने। कुछ भी हो लेकिन मेरा खुद का मानना भी यही है कि कुछ तो खास इस बार होना चाहिए। हालांकि, इस बात पर संतोष जाहिर किया जा सकता है कि यह केस मात्र ५२१ दिन में ही पूरा हो गया और उसे दोषी करार दिया गया। शायद यही कारण है कि लोगों में न्यायपालिका के प्रति थोड़ा बहुत सम्मान अभी बचा है। अगर सजा का निर्धारण भी जल्द कर लिया जाए और उसका क्रियान्वयन भी द्रुत गति से हो तो शायद लोगों के मन में यह आए कि चलो कोई हो या न हो लेकिन न्यायपालिका अभी जिंदा है और उस पर भरोसा किया जा सकता है। परन्तु इस किस्से के कई और पहलु भी हैं उनमे से एक है देविका. दस साल की देविका को 17 महीने पहले दहशतगर्द अजमल आमिर कसाब ने बड़ा जख्म दिया था, लेकिन देविका ने भी बड़ी हिम्मत दिखाते हुए कसाब के मुकद्दमे में मील के पत्थर की भूमिका अदा की। अदालत में कसाब की पहचान का सिलसिला देविका के बयान से ही शुरू हुआ था। फिर एक बच्ची का हौसला देखकर मुंबई में इंसाफ पाने का ऐसा जज्बा जगा कि 653 लोग गवाही के लिए अदालत पहुंच गए। कई लोगों को मौत के घाट उतारने वाले कसाब की बंदूक से निकली एक गोली मुंबई के सीएसटी स्टेशन पर सुमेरपुर (पाली) की देविका के पैर में लगी थी।अदालत में बेशर्मी से मुस्कराने और पेशी पर लाने के दौरान पुलिसकर्मियों का मजाक उड़ाने वाला कसाब, देविका को देख पहली बार शर्मसार हुआ था, तब उसने कहा था ‘जज साहब मुझे फांसी दे दो’।मुंबई पर हमले वाले उस दिन देविका के परिवार को पुणे में रहने वाले बेटे भरतकुमार से मिलने जाना था। 14 वर्षीय बेटे जयेश और बेटी देविका के साथ, पिता नटवरलाल ट्रेन पकड़ने के लिए सीएसटी स्टेशन पर बैठे थे। अचानक भगदड़ मच गई। सामने दो युवक फायरिंग करते दिखे। लोगों को हताहत होते देख जयेश दूसरी तरफ भागा। देविका पिता के साथ वहीं खड़ी रही। कोई कुछ समझ पाता इससे पहले ही एक आतंकवादी ने देविका के दाहिने पैर में गोली मार दी। थोड़ी देर बाद देविका बेहोश हो गई’। अदालत की कार्रवाई के दौरान बच्ची को बार-बार वहां ले जाना आसान नहीं था। लेकिन सब चाहते थे कि आतंकवादी को उसके गुनाहों की सजा मिले। दूसरा पहलु हैं श्री वी डी जेंडे जिन्होंने कसाब और उसके दुसरे साथी अबू के हमलों के समय अपनी अनौंसर की ड्यूटी पर तैनात थे. अपने जीवन पर आये खतरे से न घबराते हुए अपनी ड्यूटी पर तैनात रहे और लोगों को पिछले निकास की ओर से निकल जाने के लिए लगातार अनाउंस करते रहे. तीसरे हैं छोटू शेख चायवाला जिसने सी एस टी टिकट काउंटर पर गोली लगने के बाद भी घायलों को ठेले पर लादकर अस्पताल पहुंचता रहा. चौथे हैं सेबेस्टियन डिसूजा मुंबई के एक छोटे दैनिक के फोटोग्राफर जो हमले के समय सीएसटी पर ही थे और उन्होंने कसाब और उसके साथी की तस्वीरे खेंची और पुलिस को बताया जिस वजह से उसे सजा मिली. फिर आते हैं चंद्रकांत टिके, कामा अस्पताल के सिक्योरिटी गार्ड जिन्होंने अपनी जान की परवाह ना करते हुए उन नौ लोगों का पता कसाब और उसके साथी को नहीं बताया और उनकी जान बचाई. अरुण जाधव मुंबई पुलिस कांस्टेबल जो शहीद कामते, सालसकर, और करकरे जैसों का जांबाज़ सहयोगी रहा और उस खौफनाक रात को उनके साथ उसी वाहन में थे. लाशों के बीच घायल होते हुए भी लाश की तरह पड़े रहे और मौका मिलते ही कंट्रोल रूम को इस घटना की जानकारी दी. इन सबके साहस और सूझबूझ ने आज किलिंग मशीन कसाब को उसका अंत दिखा दिया है. पर सबसे बड़ा श्री जाता है हमारे गृह मंत्री श्री पी चिदम्बरम को जिन्होंने नेपथ्य में रहकर भी अपने कानून के ज्ञान का पूरा उपयोग करते हुए कसाब के खिलाफ ऐसा डोजियर तैयार किया जिसकी काट ना तो पकिस्तान के पास थी और न ही उसके आकाओं के पास. सही में धन्यवाद के पात्र हैं चिदम्बरम साहेब. कसाब के खिलाफ फांसी का ऐसा फंदा तैयार किया है की आज न कल उसे इस पर लटकना ही पड़ेगा. इससे बचने के लिए चाहे वो बयां बदले या कुछ भी करे. इस कविहृदय के उदगार को ग्रहण करें.
दहशतगर्द कसाब को फांसी आई याद
अपने पूर्व बयान से मुकर गया जल्लाद
मुकर गया जल्लाद हुई ज्यों ही सुनवाई
बतलाता निर्दोष स्वयं को आज कसाई
दिव्यदृष्टि है ढीठ बहुत ये जालिम बंदा
अत: गले में जल्द डालिए इसके फंदा