Thursday, July 29, 2010

स्त्री


क्या तुम जानते हो एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण ?

बता सकते हो तुम एक स्त्री को स्त्री द्रष्टि से देखते उसके स्त्रीत्व की परिभाषा ?

अगर नहीं तो फिर जानते क्या हो तुम रसोई और बिस्तर के गणित से परे

एक स्त्री के बारे में….?

जानने की कोशिश करो पर पहले तो बदलो अपनी दृष्टि को

एक पुरुष की जगह एक पुत्र, एक भाई एक पिता बनो

ओढ़ता,बिछाता,और भोगता शरीर को जीता पुरुष

शरीर के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता उसका प्यार-दुलार,मनुहार

सभी कुछ शरीर की परिधि से बंधा होता है…

लेकिन औरत, शरीर के बाहर भी बहुत कुछ होती है…

वह होती है जननी और सृष्टा मानव जाती की

वह होती है शक्ति दुर्गा, काली, लक्ष्मी, और सरस्वती

शक्ति का अपूर्व भंडार जो भरता है तुम्हारी रगों में

इसलिए जितना सताओगे उतना उठुगीं

जितना दबाओगे उतना उगुगीं

जितना बाँधोगे उतना बहूंगी

जितना बंद करोगे उतना गाऊँगी

जितना अपमान करोगे उतनी निडर हो जाउंगी

जितना सम्मान करोगे उतनी निखर जाउंगी

Thursday, July 8, 2010

दिल्ली की बारिश: डर लागे गरजे बदरिया

दिल्ली की बारिश मानो लौटरी, दिल्ली तक आते-आते बादलों का हाथ तंग हो जाता है, सो सोच समझ बरसते हैं। खैर दिल्ली में हर काम में सोचा जयादा जाता है, किया कम जाता है। चाहे वो नेता हों या जनता। बादलो को यह भाषा दिल्ली में घुसते ही समझ आ जाती है फिलहाल हाल तो हमेशा की तरह यही है की बारिश न हो तो समस्या और अगर हो जाए तो दिल्ली वालों की मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं।दिल्ली में मंगलवार सुबह हुई झमाझम बारिश ने दिल्ली वासियों से मुरझाये चेहरे पर खुशी की लहर ला दी. सुलगती गर्मी के आतंक से झुलसती दिल्ली ने बारिश की बुंदों से राहत की सांस ली है। सुबह हुई बारिश ने तापमान काफी कम कर दिया जिसके कारण मौसम बेहद सुहावना हो गया था. पर मंगलवार के बाद हालाँकि कल बुधवार को दिल्ली में हुई बारिश की मात्र कुछ खास नहीं मात्र २१.२ मिमी ही थी, पर इतनी ही बारिश दिल्ली की सिविक एजेंसियों की तैयारी को दिखने के लिए काफी था. दिल्लीवासियों के लिए यह एक भयावह मंजर था. मेरी एक घनिष्ठ मित्र जो की एक निजी बैंक में काम करती हैं उन्होंने बताया की जैसे ही उन्होंने डीएनडी फ्लायओवर का गेट पार किया और रिंग रोड पर पहुंची तो करीबन चार घंटे तक वह रिंग रोड पर ही फँसी रही. किसी तरह उन्होंने अपनी कार शांति पथ की तरफ मोड़ी तो उधर भी जाम. अंततः वह अपने घर नारायणा पहुंची पर करीब ६ घंटे के बाद. अन्य मार्गों पर ट्रेफिक रेंगता तो रहा पर सबसे बुरी हालत थी सेन्ट्रल, दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी दिल्ली की. धौला कुआँ पर ग्रेड विभाजक का एक हिस्सा तो पानी में ऐसा डूबा की उसे बंद करना पड़ा और उसका असर तुरंत दिखा शांति पथ, मोती बाग, अफ्रीका अवेन्यु मार्ग, सरदार पटेल मार्ग, रिज रोड, इन सबों पर ऐसा ट्रेफिक जाम हुआ की सेन्ट्रल दिल्ली से आने वाले ट्राफिक के लिए इन्हें बंद करना पड़ा. मंगलवार की बारिश के बाद राजधानी के कई अंडरपास और फ्लाई ओवरों के ढलानों पर भरा पानी बुधवार की दोपहर तक भी निकल नहीं पाया था। बुधवार दोपहर बाद हुई तेज बारिश से धौला कुआं अंडरपास लबालब हो गया, जिसकी वजह से आसपास के सभी रास्तों पर भारी जाम लग गया। आर.के. पुरम और मुनीरका तक गाड़ियों की कतारें लगी हुई थीं, तो दूसरी तरफ दिल्ली कैंट तक जाम था। वाहन चालकों ने तीन मूर्ति और ग्यारह मूर्ति का रुख किया, तो वहां भी कई किलोमीटर लंबा जाम लग गया। स्विमिंग पूल बन चुके धौला कुआं अंडरपास के सामने ट्रैफिक पुलिसवाले बेबस नजर आए। ग्रीन पार्क से युसूफ सराय के बीच सड़क का एक बड़ा हिस्सा धंस जाने से अरबिंदो मार्ग जाम हो गया. हालात तो और ख़राब तब हो गए जब की कई ट्राफिक सिग्ननल बारिश और पॉवर कट की वजह से फेल हो गए और चौराहों और सड़कों पर बिलकुल अराजक स्थिति उत्पन्न हो गयी. एम् बी रोड पर एक भी सिग्नल काम नहीं कर रहा था. गाड़ियाँ रोंग साइड चल रही थी और एक एक क्रोसिंग पार करने में १५ से २० मिनट लग रहा था. सुनने में यह भी आया की आश्रम और सराय काले खान के बीच वी आइ पी मोवेमेंट की वजह से करीब आधे घंटे के लिए डी एन डी फ्लाय ओवर को बंद किया गया था पर उसकी वजह से जो जाम शुरू हुआ वह इंडिया गेट तक फ़ैल गया क्योंकि ये सारे इलाके थोड़ी देर के लिए ही सही ट्राफिक मोवेमेंट के लिए रोक दिए गए थे ताकि वी आइ पी को कोई अवरोध ना मिले. पर यह एक सच्चाई है की सिविक एजेन्सिएस यथा एमसीडी की गैर दूरंदेशी का नतीजा आखिरकार वही हुआ जिसकी आशंका थी। मॉनसून की पहली ही बारिश में एमसीडी के तमाम दावे धरे रह गए और जगह-जगह हुए जलभराव से लोगों को दिक्कतें हुईं। सोमवार को तो बंद की वजह से सड़कों पर ट्रैफिक बहुत कम था, इसलिए हालात सामान्य लग रहे थे, लेकिन मंगलवार सुबह राजधानी के कई इलाकों में हुई तेज बारिश के बाद जब लोग घरों से निकले, तो उन्हें जगह-जगह सड़क पर भरे पानी के बीच से गुजरना पड़ा। इस साल भी ट्रैफिक पुलिस ने मॉनसून से काफी पहले एमसीडी को आगाह कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद वैसा ही हुआ जैसा हर साल होता है। कई सड़कें स्विमिंग पूल में तब्दील हो गई और ट्रैफिक जाम के हालात बन गए। कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए चल रहे निर्माण कार्यों की वजह से पहले ही दिल्ली की सड़कों की हालत खस्ता है, ऐसे में मॉनसून की पहली बारिश से यह भी साफ हो गया कि आने वाले दिन और भी मुश्किल भरे हो सकते हैं।
सबसे ज्यादा जलभराव राजधानी के अंडरपास और फ्लाईओवरों के ढलानों पर हुआ। अशोक विहार के पास लॉरेंस रोड पर बने जिस नए-नवेले अंडरपास का दो दिन पहले ही धूमधाम से उद्घाटन किया गया था, उसमें मंगलवार को बारिश के बाद घुटने-घुटने तक पानी भर गया। पानी भर जाने की वजह से कई वाहन यहां से गुजरते वक्त खराब होकर बंद हो गए, जिन्हें धक्का लगाकर निकालना पड़ा। इसकी वजह से आसपास के रास्ते पर लंबा जाम लग गया। धौलाकुआं, द्वारका, मूलचंद, प्रेम बाड़ी और वजीरपुर इंडस्ट्रियल एरिया स्थित रेलवे अंडरपास का भी यही हाल हुआ। यहां भी जलभराव से ट्रैफिक पर असर पड़ा और जाम के हालात बने रहे।इसके अलावा शादीपुर, मोती बाग, पंजाबी बाग, कीर्ति नगर और जखीरा जैसे व्यस्त फ्लाईओवरों के ढलानों पर जलभराव की वजह से देर तक जाम लगा रहा। मायापुरी-रिंग रोड क्रॉसिंग, नारायणा टी पॉइंट, मोती नगर, कर्मपुरा, जीटी करनाल डिपो, जहांगीरपुरी कैरिज वे, ब्रिटानिया चौक और संसद विहार से पीतमपुरा पुलिस लाइन की तरफ जाने वाले रास्ते पर जलभराव से जाम के हालात बने रहे। वेस्ट पटेल नगर में बारिश से ठीक पहले केबल डालने के लिए सड़क खोदी गई थी, लेकिन बारिश के बाद उसमें पानी भर गया और मंगलवार को एक कार उसमें फंस गई। कार चालक बाल-बाल बचा। उधर, कनॉट प्लेस में भी बारिश के बाद बुरा हाल हो गया और दोपहर में यहां भी जाम लगा रहा। यहां चल रहे निर्माण कार्य की वजह से पहले ही पैदल चलना दूभर हो गया था, ऐसे में बारिश के बाद हालात और खराब हो गए। यहां जगह जगह पानी भर गया और कीचड़ जमा हो गया। ट्रैफिक पुलिस के मुताबिक , मंगलवार को ट्रैफिक हेल्पलाइन पर सुबह से शाम तक जलभराव की वजह से जाम लगने संबंधी 15 कॉल्स आईं , जबकि एमसीडी के सेंट्रल कंट्रोल रूम में जलभराव संबंधी 55 और पेड़ गिरने की 4 कॉल आईं। जलभराव की सबसे ज्यादा 13 कॉल्स रोहिणी जोन से आई , जबकि 11 कॉल्स साउथ जोन से आई। ट्रैफिक पुलिस का मानना है कि अगर एमसीडी के इंतजामों का यही हाल रहा , तो आने वाले दिन वाहन चालकों के लिए और भी मुश्किल भरे हो सकते हैं।
वास्तविकता तो यह है की राजधानी दिल्ली हर मानसून में भीगी बिल्ली बन बैठती है। यह प्रशासन को भी पता होता है कि मानसून में बारिश होगी और पानी भरेगा। इसकी तैयारियों के लिए ड्रेनेज सफाई के नाम पर पैसे भी पानी की तरह बहते हैं। पानी निकासी की परियोजनाएं ागजों पर पैसे की निकासी की जाती है। इंतजाम की पोल मानसून खोलता है। बरसाती नालों पर अवैध कब्जों से प्राकृतिक जल निकासी की व्यवस्था नहीं रही, कृत्रिम अव्यवस्था का अंजाम जनता भोगे।

प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो

आज काफी समय बाद थोडा चैन से बैठी हूँ . एक पुराना अखबार हाथ लगा और उसमे एक खबर थी मॉडल विवेका बालाजी की आत्महत्या की. खबर पढ़ते ही मुझे याद आ गई मधुर भंडारकर की रियल टाइम मूवी फैशन की और याद आया एक किरदार कंगना रानावत ने निभाया था. मॉडलिंग की दुनिया का वह नंगा सच जो मधुर ने दिखने की कोशिश की थी एक बार फिर नग्नता की पराकाष्ठा के साथ हमारी नजरों के सामने था. विवेका बाबजी की आत्महत्या के कारणों की बात जब भी उठती है, गौतम वोरा का नाम जरूर आता है। प्राय: सभी का मानना है कि अगर गौतम ने उसके साथ बेवफाई न की होती, तो वह आज जीवित ही नहीं, स्वस्थ-प्रसन्न होती। विवेका ने आत्महत्या की रात अपनी डायरी में लिखा था, यू किल्ड मी, गौतम। यह किसी ऐसे व्यक्ति की कराह लगती है जिसे अपने जीवन का सबसे बड़ा झटका लगा हो। इसीलिए सबकी सहानुभूति विवेका के साथ है। गौतम वोरा सबकी निगाह में खलनायक हो गया है। एक पत्रकार ने तो यहां तक लिख डाला कि विवेका की जान इसलिए गई कि उसने गलत आदमी का चुनाव किया था। गौतम वोरा के अलावा कोई और नहीं जानता न जान सकता है कि विवेका के साथ उसका रिश्ता क्या था? शायद विवेका भी नहीं जानती थी। अगर जानती होती, तो वह इतने विषाद में न पड़ती कि मृत्यु के चयन के अलावा उसे कोई और रास्ता न दिखाई पड़े। वैसे प्रेम में निराशा या बेवफाई का सदमा जरूरी नहीं कि आदमी को खुदकुशी की ओर ले जाए। आत्महत्या के मनोविज्ञान का अध्ययन करने वालों का कहना है कि कोई भी घटना सभी व्यक्तियों को एक ही तरह से प्रभावित नहीं करती। ऐसे भी लोग हैं जो मामूली-सी बात पर आत्महत्या कर लेते हैं। दूसरी तरफ, कुछ व्यक्तित्व इतने मजबूत होते हैं कि बड़ी-बड़ी घटनाओं को अपने ऊपर हावी होने नहीं देते। सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि दुनिया की आपकी समझ कैसी है। विवेका के अनेक मित्रों और परिचितों ने उसकी स्थिति और उसके मनोविज्ञान पर प्रकाश डालने की कोशिश की है। इनसे संकेत मिलता है कि उसका दुख किसी एक तरह का नहीं था। हो सकता है, बेवफाई के एहसास ने विवेका को उस बिंदु पर पहुंचा दिया हो जहां से लौट कर कोई वापस नहीं आता। गौतम से अपने संबंध को विवेका जिस तरह से समझ रही थी, जरूरी नहीं कि विवेका से अपने संबंध को गौतम भी उसी स्तर पर महसूस कर रहा होगा। कोई और आदमी यह भी ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि दोनों के बीच जो संबंध था, उसे प्रेम के नाम से परिभाषित करना तर्कसंगत होगा या नहीं। प्रेम भी सबके लिए एक ही अर्थ नहीं रखता। एक बार महात्मा गांधी ने कहा था कि धर्म उतने हो सकते हैं जितने लोग धरती पर रहते हैं। कारण, ईश्र्वर से सबका रिश्ता अपना-अपना होता है और नैतिकता की सबकी समझ भी अपनी-अपनी होती है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि प्रेम भी उतनी तरह का हो सकता है जितनी तरह के लोग धरती पर रहते हैं। इसलिए कोई दूसरे के प्रेम की तुलना अपने प्रेम से क्यों करे। नि:संदेह बेवफाई बुरी चीज है, लेकिन कोई बेवफाई करता क्यों है? इसे समझे बिना दोष निरूपण का तरीका न्यायसंगत नहीं हो सकता। जीवन के दूसरे संबंधों की तरह, प्रेम को भी हम एक स्थायी बंदोबस्त मानने के आदी हैं। जीवन में और खासकर संबंधों में कुछ भी स्थाई नहीं होता। स्थाई हो ही नहीं सकता, ऐसा नहीं है। ज्यादातर संबंध स्थाई ही होते हैं, खासकर जब वे विवाह में परिणत हो जाते हैं, लेकिन बिना विवाह के भी आखिरी सांस तक प्रेम के अनेक उदाहरण दिखाई पड़ते हैं। जब हम किसी संबंध में उतरते हैं, तो यह मानकर ही उतरते हैं कि यह अनंत भविष्य तक जारी रहेगा। हमारे यहां जनम-जनम के साथ की बात की जाती है, हालांकि अधिकांश युगल दिली तौर पर नहीं चाहते होंगे कि अगले जन्म में भी यही साथ मिले। संबंध अक्सर पुराने जूतों की तरह हो जाता है, जिनमें हमारे पैर आराम महसूस करते हैं। इसके बावजूद, जब जूते फट जाते हैं तो उन्हें बदलना ही पड़ता है। ईश्र्वर का लाख-लाख धन्यवाद कि उसने हमें पिछले जन्मों की स्मृतियों से वंचित कर रखा है। नहीं तो यह दुनिया नरक हो जाती। जब एक शरीर के विनाश के बाद आत्मा नए वस्त्र पहनती है और जीवन की एक नई इकाई के रूप में दुनिया में लौटती है, तो उसे नए संगी-साथी चाहिए होते हैं। इसी तरह, क्या एक ही जन्म में आदमी बार-बार मरता और फिर-फिर नहीं पैदा होता है? तो क्या आदमी को अपनी प्रतिश्रुति से बंधा नहीं होना चाहिए? अगर सभी लोग क्षण में जीना शुरू कर दें और आज के व्यवहार तथा कल के व्यवहार में कोई तारतम्य न रह जाए, तो इससे जो अराजकता पैदा होगी, उसे हममें से कौन सह सकता है? क्षण सत्य है, पर क्षणों का सिलसिला भी कम सत्य नहीं है। इसलिए परिवर्तन और निरंतरता, दोनों के मेल से ही जीवन में खुशबू आती है। जो वादे कानूनी तौर पर किए जाते हैं, उन्हें निभाना किसी भी आदमी का न्यूनतम कर्तव्य है। ऐसे वादों को कानून की शरण में जा कर ही तोड़ा जा सकता है। नहीं तो दुनिया चल नहीं सकती। इसके विपरीत, व्यक्तिगत स्तर पर किए गए वादे को उस क्षण का वादा समझकर चलने में ही भलाई है। जब कोई लड़की किसी लड़के से कहती है-आइ लव यू, तो यह उसकी उस क्षण की भावना है। और, किसी भी भावना को शाश्र्वत मानकर नहीं चला जा सकता। जब कोई जीवन किसी एक क्षण से बंध जाता है, तो वह जंजीर की फंसावट का शिकार हो जाता है। जीवन तभी तक मजेदार है, जब तक वह स्वतंत्र है। यह मान कर चलना ही सत्य के साथ तंदुरुस्त रिश्ता बनाना है।

Tuesday, July 6, 2010

छिछोरेपन की राजनीति

"हड़ताल विरोध जताने की एक कालविरुद्ध विधा है"

विपक्षी दलों द्वारा प्रायोजित राष्ट्रव्यापी बंद शायद अपने उद्देश्य में सफल रहा हो और शायद उसने बढती महंगाई पर जनता के आक्रोश को अपने पक्ष में भुनाने में आंशिक सफलता भी पायी हो किन्तु यह भी एक अटल सत्य है की जब भी आर्थिक परिस्थितियोंवश बढती महंगाई पर सरकार काबू पाने में सफल होने लगती है बस तभी एन डी ए नीत विपक्ष को जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी याद आने लगाती है. इस बार भी ऐसा ही कुछ करने की योजना बनायीं गयी और जिसका मूर्त रूप कल देखने को मिला. महंगाई के विरुद्ध विपक्ष का "भारत बंद" कितना सफल या कितना असफल रहा, यह राजनैतिक दलों के बीच विवाद का विषय जरूर हो सकता है , लेकिन आम जनता के लिए सफलता या असफलता उसे हुई दिक्कतों के पैमाने पर ही नापी जायेगी. जिन लोगों की ट्रेन या बस या फ्लाईट रद्द हो गयी या अपने शहर में ही जरूरी काम के लिए पहुँचाना नामुमकिन हो गया उन जैसे कई लोगों के लिए ऐसा बंद या उसकी सफलता या असफलता का कोई मायने नहीं होगा. वैसे लोग जो किसी न किसी प्रकार से अपने-अपने गंतव्य पर पहुँच गए और अपनी अपनी नौकरी की उनके लिए बंद किसी प्रकार सफल भी नहीं रहा होगा किन्तू वैसे लोग जिनकी आजीविका "रोज कुआँ खोदने और रोज पानी पीने" जैसे स्त्रोतों पर निर्भर है उनके लिए बंद किसी दुस्वप्न से कम नहीं है. बढती महंगाई चिंतनीय विषय है और उसपर विपक्ष का आवाज उठाना भी जनता को स्वीकार्य है किन्तु विरोध का ऐसा तरीका जिससे खुद जनता की ही परेशानियों में इजाफा हो कम से कम यह तो स्वीकार्य नहीं. देश के कई भागों में खासकर वहां जहाँ भाजपा या उसके सहयोगी दलों तथा वाम मोर्चे की सरकारे थी वहां सोमवार को आर्थिक गतिविधियाँ नगण्य रहीं हालाँकि राजधानी दिल्ली पर इसका कोई खास प्रभाव नहीं दिखा पर आर्थिक राजधानी मुंबई की रफ़्तार धीमी हो गयी थी. केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य तो बिलकुल ठप्प पड़ गए थे. हड़ताल से हुई आर्थिक क्षति का अंदाजा तो अभी बांकी है परन्तु यह काफी गंभीर होगा यह एक अटल सत्य है और इससे भी ज्यादा होगा जन्संपत्ति को हुई क्षति की क्षतिपूर्ति. और बढती महंगाई की आंच तले इस गंभीर नुक्सान की भरपाई कोढ़ में खाज जैसे तकलीफ दे रही है. बंद और हड़ताल आदि के प्रति जनता का रवैया हमेशा से पीछा छुड़ाने जैसा रहा है. अगर ऐसी घटनाओं के दिन जनता अपने घरों से बाहर नहीं निकलती तो मात्र शारीरिक हिंसा के भय से. जनता के मन में काफी क्षोभ है इस बात को लेकर की क्यों ऐसी पार्टियां आम आदमी के नाम से एक जबरदस्ती का चक्का जाम करती है जबकि नुक्सान उसी आम आदमी का होता है. भारत बंद को सफल-असफल बताने के दोनों पक्षों के दावे के बीच इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती कि आम जनता इस आयोजन में शामिल होने के लिए स्वेच्छा से आगे नहीं आई.क्या विपक्ष इस पर विचार करेगा कि एक ऐसे समय आम जनता उसके आयोजन में सहभागी क्यों नहीं बनी जब बढ़ती महंगाई उसे वास्तव में त्रस्त कर रही है? बल्कि बंद को सफल बनाने के लिए जो जतन किए गए उससे यही संदेश गूंजा कि महंगाई से त्रस्त जनता को विपक्ष ने और त्रस्त किया. जिस कैरोसीन को आम गरीब जनता का ईधन कहा जाता है और इसकी कीमत को लेकर राजनीति करने में एन डी ए शासित दो प्रमुख राज्य अग्रणी हैं. राष्ट्रव्यापी बंद का आह्वान करने में एनडीए आगे रहा है, लेकिन इसके दो राज्यों में केरोसिन पर आम आदमी से 10 फीसदी से ज्यादा का कर वसूला जा रहा है। पंजाब में अकाली दल व भाजपा की सरकार केरोसिन पर पांच फीसदी वैट के अलावा 10 फीसदी का अतिरिक्त कर वसूल रही है यानी 15 फीसदी का कर। दूसरे स्थान पर भाजपा और जनता दल (यू) वाली बिहार सरकार है। इसने तो केरोसिन पर 12.50 फीसदी का मूल्यव‌िर्द्धत कर (वैट) लगा रखा है. जिसे एक तरफ राजनीतिक दल गरीबों का उत्पाद बता रहे हैं उसे बाहर से ले लाने पर अतिरिक्त टैक्स लगा रहे हैं। अगर राजनीतिक दलों को वाकई गरीब जनता से इतना ख्याल होता तो वे अपने-अपने राज्यों में केरोसिन पर शुल्क कम कर सकते थे. इसके बाद बढ़ती कीमतों पर विपक्षी सोच की गंभीरता का अंदाजा अपने आप लग जाता है. दरअसल अनुभव यही रहा है की बंद की सफलता राजनैतिक ताकत से ज्यादा बाहुबल और उत्पात करने की क्षमता पर निर्भर होती है, अक्सर बंद तोड़फोड़ के दर से सफल होता है. दरअसल इन बंद और हड़ताल के प्रति जनता का व्यवहार एक सनक और तिरस्कार की तरह ही रहा है. जिस पेट्रोलियम पदार्थों की बढती कीमतों का बहाना लेकर इस बंद का आवाहन किया गया था यदि याद हो तो इसकी शुरुआत इनपर से सरकारी नियंत्रण हटाने को लेकर 1996 की वाममोर्चा समर्थित देवगौड़ा सरकार ने की थी और आज की एन डी ए उर्फ़ भाजपा ने ही इस बात का प्रस्ताव किया था की इन कीमतों को बाजार के ऊपर ही छोड़ देना चाहिए. दरअसल राजनीतिक पार्टियाँ इस संविधानिक एवं संसदीय तंत्र की हिस्सेदार हैं और यह उनकी भी जिम्मेदारी बनती है की वे जिस बात का विरोध कर रही है उसका विकल्प भी उनके पास मौजूद होना चाहिए वर्ना जनता का भरोसा कल की ही तरह उनपर से उठ जाएगा.