Thursday, July 29, 2010

स्त्री


क्या तुम जानते हो एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण ?

बता सकते हो तुम एक स्त्री को स्त्री द्रष्टि से देखते उसके स्त्रीत्व की परिभाषा ?

अगर नहीं तो फिर जानते क्या हो तुम रसोई और बिस्तर के गणित से परे

एक स्त्री के बारे में….?

जानने की कोशिश करो पर पहले तो बदलो अपनी दृष्टि को

एक पुरुष की जगह एक पुत्र, एक भाई एक पिता बनो

ओढ़ता,बिछाता,और भोगता शरीर को जीता पुरुष

शरीर के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता उसका प्यार-दुलार,मनुहार

सभी कुछ शरीर की परिधि से बंधा होता है…

लेकिन औरत, शरीर के बाहर भी बहुत कुछ होती है…

वह होती है जननी और सृष्टा मानव जाती की

वह होती है शक्ति दुर्गा, काली, लक्ष्मी, और सरस्वती

शक्ति का अपूर्व भंडार जो भरता है तुम्हारी रगों में

इसलिए जितना सताओगे उतना उठुगीं

जितना दबाओगे उतना उगुगीं

जितना बाँधोगे उतना बहूंगी

जितना बंद करोगे उतना गाऊँगी

जितना अपमान करोगे उतनी निडर हो जाउंगी

जितना सम्मान करोगे उतनी निखर जाउंगी

1 comment:

  1. जितना अपमान करोगे उतनी निडर हो जाउंगी / जितना सम्मान करोगे उतनी निखर जाउंगी.... वाह....औरत के भीतर का सच और इतनी सादग़ी से....शुभकामनाएं अनामिका जी.

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