Sunday, October 31, 2010

ओबामा की भारत यात्रा बनाम अमेरिका का भविष्य


अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा 2008 में जब पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने तब मीडिया ने उन्हें किस्मत का धनी करार दिया। खुद ओबामा ने भी इस बात को स्वीकारा, लेकिन एक सच यह भी है कि ओबामा ने व्हाइट हाउस में जिस दिन कदम रखा था उसी दिन भाग्य उनका साथ छोड़ गया था। पूर्ववर्ती जॉर्ज डब्ल्यू बुश की सनक भरी नीतियों के परिणामस्वरूप इराक-अफगान युद्ध, आतंकवाद और चरमराई हुई अर्थव्यवस्था जैसी दुष्कर चुनौतियां ओबामा को विरासत में मिलीं। अमेरिकी उन्हें करिश्माई मानते हैं, इसलिए उम्मीदें का बोझ उनके कंधों पर कुछ ज्यादा ही है। ऐसा नहीं कि वह हर मोर्चे पर असफल ही रहे हैं, लेकिन आर्थिक बदहाली ने अमेरिकियों में कुछ ज्यादा ही असंतोष पैदा कर दिया है। इसमें शक नहीं कि ओबामा वादों को पूरा करने का दम रखते हैं। इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी उन्हीं के प्रयासों से हुई। बुश प्रशासन से तुलना करें तो ओबामा के निर्णय बेहतर साबित हुए हैं। रूस-अमेरिका के बीच मित्रता इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है, लेकिन बेरोजगार होते अमेरिकी इंतजार नहीं करना चाहते हैं और ना ही उनमे और इंतज़ार करने का दम बचा है। वे बदलाव को विकल्प के रूप में देख रहे हैं। निश्चित रूप से घरेलू मोर्चे पर सफलता पाना आसान नहीं। ओबामा को एक बार फिर भाग्य का सहारा चाहिए। वह छह नवंबर को भारत दौरे पर आ रहे हैं। व्हाइट हाउस के रणनीतिकार भारत दौरे के जरिए अमेरिका में रोजगार सृजन करने के लिए प्रयासरत हैं। भाग्य का खेल देखिए कि अमेरिका में कांग्रेस चुनाव के मात्र चार दिन बाद ओबामा भारत आएंगे।पिछले कुछ दशकों की बात करें तो 80, 90 और 2000 के दशक में अब तक जितने भी कांग्रेस चुनाव हुए उनमें सत्ताधारी दल को जनता के रोष का सामना करना पड़ा। कांग्रेस चुनावों का प्रारूप अमेरिका में कांग्रेस चुनावों को मिड-टर्म इलेक्शन कहा जाता है।इधर कांग्रेस चुनाव (मिड-टर्म इलेक्शन) के प्रति पहले से आशंकित सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी 2012 में राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए बराक ओबामा के नाम पर एकमत नहीं है। हालांकि पार्टी के अधिकतर सदस्य उन्हें अगले राष्ट्रपति चुनावों में भी खड़ा होते नहीं देखना चाहते हैं, लेकिन उनके विरोधियों की संख्या अब पहले की तुलना में बहुत अधिक बढ़ गई है। अगर वह सफल होकर लौटे तो हो सकता है कि वह अमेरिकियों का खोया विश्वास फिर से पा सकें। दरअसल, अमेरिकी सिर्फ आर्थिक बदहाली के चलते ओबामा से नाराज हैं। ओबामा ने अब तक जितने भी एशियाई देशों की यात्रा की, उनमें सामरिक हितों पर अधिक ध्यान दिया, लेकिन भारत दौरे पर ओबामा के एजेंडे में आर्थिक हित सर्वोपरी हैं। विश्लेषक उनके बारे में जो कह रहे हैं-उसमें गलत कुछ भी नहीं। ओबामा जानते हैं कि अमेरिकी उनसे खफा हैं। यही कारण है कि कार्यकाल के शुरुआती दौर में वैश्विक मुद्दों पर ज्यादा ध्यान देने वाले ओबामा पिछले कई महीनों से घरेलू समस्याओं पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं। विश्लेषकों की राय में आर्थिक मंदी, बेरोजगारी, कटौती आदि को मतदाता बेहद खफा हैं। ओबामा ने अपने घर के समीप भीड़ को संबोधित करते हुए कहा, शिकागो, यह जिम्मा आपका है कि आप उन्हें बताएं कि हम कुछ भी नहीं भूले हैं। उनका संकेत पूर्ववर्ती जॉर्ज डब्ल्यू बुश प्रशासन के कार्यकाल में आई मंदी की ओर था। उन्होंने कहा कि चुनाव उन दो तरह की नीतियों के बीच चयन का विकल्प देते हैं, जिनमें एक तो समस्याएं उत्पन्न करती हैं और दूसरी नीतियां देश को सुनहरे भविष्य की ओर ले जाएंगी। पर वैश्विक पटल से ओबामा की दूरी को अंतरराष्ट्रीय मीडिया भलि-भांति जानता है। इससे साफ संकेत मिलता है कि ओबामा घर में पल रहे असंतोष से वाकिफ हैं और अब उन्होंने अमेरिकी अर्थव्यस्था को पटरी पर लाने के लिए कमर कस ली है। अमेरिका में आधारभूत ढांचे पर 50 अरब डॉलर खर्च करने की योजना और भारत यात्रा पर आर्थिक मुद्दे प्राथमिकता में होना इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। देखना यह है कि परिणाम कैसे आते हैं? क्योंकि इन्ही पर भविष्य के अमेरिका की दशा और दिशा तथा ओबामा का भविष्य निर्भर करेगा.

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