Saturday, November 27, 2010

क्या बदल गया बिहार?


हिटलशाही के दौर में एक कहावत बहुत मशहूर हुई थी. एक झूठ को सौ बार बोलो, वो सच हो जाएगा. और बकायदा झूठ को प्रचारित करने के लिए हिटलर ने एक मंत्री की भी नियुक्ति की थी. ताजा उदाहरण बिहार सरकार है. विकास और सुशासन की छवि, जो यहां बनी नहीं बनाई गई है, उसमें भी इसी फॅर्मूले का इस्तेमाल किया गया है. यानि, जितना विकास हुआ नहीं उससे कहीं ज्यादा इसके बारे में लोगों को बताया जा रहा है. और,बार-बार बताया जा रहा है. जाहिर है, इसके लिए मीडिया का सहारा लिया गया और जम कर विज्ञापन बांटे गए. सूबे के मुख्यमंत्री नीतीशकुमार के चार साल के कार्यकाल में करीब 65 करोड रूपये से भी ज्यादा के विज्ञापन विभिन्न अखबारों और न्यूज चैनलों को बांटे गए. जाहिर है, बुलबुल भी वैसी ही नाचेगी जैसे पैसा देने वाला चाहता है. हुआ भी ऐसा ही. करोडों का विज्ञापन लेने के बाद मीडिया ने भी बिहार की ऐसी छवि बनाई मानो सचमुच बिहार अब भूखमुक्त,भयमुक्त, भ्रष्टाचरमुक्त हो गया है.मीडिया ने नीतीश कुमार की जितनी बड़ी छवि गढ़ी है, बिहार की जनता ने उससे कई गुना बड़ा जनादेश उनको दिया है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बिहार विधानसभा में अब तकनीकी तौर पर विपक्ष वजूद ही समाप्‍त हो गया है। मुख्‍य विरोधी दल का दर्जा पाने के लिए किसी एक दल के खाते में कुल सीटों का दस प्रतिशत सीट होना चाहिए। लेकिन चुनावी नतीजे बता रहे हैं कि राजद-लोजपा 25 सीटों पर ही निपट गये। प्रथम मुख्‍यमंत्री श्रीकृष्‍ण सिंह और राबड़ी देवी के बाद नीतीश कुमार पहले मुख्‍यमंत्री है, जिन्हें लगातार दूसरी बार बिहार का मुख्‍यमंत्री बनने का अवसर मिला है। इस भारी जीत की चुनौतियां कितनी भारी हैं, इसे नीतीश कुमार से अधिक और कौन समझ सकता है। यही वजह है कि नतीजे आने के तुरंत बाद नीतीश कुमार जब मीडिया से मुखातिब हुए, तो चुनौतियों के बोझ तले दबे दिखे। उन्होंने कहा, मैं काम करने में भरोसा रखता हूं। मेरे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। मैं दिन-रात मेहनत करूंगा। बिहार के लोगों ने मुझमें जो विश्वास जताया है, वही मेरी पूंजी हैं। अब बात बनाने का समय नहीं है। काम करने का समय है

दरअसल, नीतीश सरकार ने मीडिया की कमजोरी को पहचान लिया था . और, यह कमजोरी है, विज्ञापन की. अफरोज आलम ने बिहार सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग से आरटीआई के तहत राज्य सरकार द्वारा जारी की गई विज्ञापन के बारे में सूचनाएं मांगी थी. प्राप्त सूचना से पता चलता है कि सरकार का काम पर कम, विज्ञापन करने पर ज़्यादा ध्यान रहा है. सूचना एवं जनसंपर्क विभाग की ओर से साल 2005 से 2010 के बीच(नीतीश कुमार के कार्यकाल के चार सालों में) लगभग 64.48 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए. जबकि लालू-राबड़ी सरकार के कार्यकाल के अंतिम 6 सालों में महज 23.90करोड़ ही खर्च हुए थे. मिली सूचना के मुताबिक सूचना एवं जन-सम्पर्क विभाग ने साल 2009-10 में (28 फरवरी 2010 तक)19,66,11,694 (लगभग 20 करोड) रूपये का विज्ञापन जारी किया है,जिसमें से 18,28,22,183 (लगभग 18 करोड से ज्यादा) रूपये का विज्ञापन प्रिन्ट मीडिया को और 1,37,89,511(लगभग डेढ करोड) रूपये का विज्ञापन इलेक्ट्रॅानिक मीडिया को दिया गया. इतना ही नहीं,नीतीश सरकार के चार वर्ष पूरे होने पर एक ही दिन1,15,44,045(लगभग 1 करोड से ज्यादा) रूपये का विज्ञापन एक साथ 24 समाचार पत्रों को जारी किया गया. इसमें भी सबसे ज्यादा एक खास समूह के अखबार को दिया गया. कुछ खास अखबारों को तो अकेले 50 लाख रूपये से ज्यादा का विज्ञापन दिया गया है.

अब ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार की असली तस्वीर और विकास की कमजोर चारदीवारी के पीछे का सच दिखा पाना ऐसे अखबारों के लिए कितना मुश्किल है. क्योंकि जब आप सच दिखाएंगे या छापेंगे तो विज्ञापन कैसे मिलेगा? और ऊपर से तुर्रा ये की बिहार में विजय की पताका फेहराने वाले नीतीश कुमार ने स्वयं को निमित्त मात्र बता कर सारी ताकत जनता को कह दिया हैं। बिहार में इतिहास बनाकर नीतीश कुमार ने देश को संदेश तो दे दिया है कि काम के आगे सारे समीकरण बेकार हैं? पर क्या कोई काम हुआ भी है. या मात्र हवाई किले ही बनाये गए हैं. प्रधान मंत्री ग्राम योजना के तहत बनायीं गयी सड़कें हो या राजीव गाँधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना से आई बिजली. सब कुछ तो केंद्र का है और केंद्र की एजेंसियों से कराया हुआ. उसमें भी जितना जनता तक पहुँचाना था वो पंहुंचा ही नहीं. "यानी बन्दर के हाथ लगी अदरक की गाँठ और बन बैठा पंसारी" . वास्तविकता में बिहार की 52 फीसदी आबादी आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करती है। बिहार की प्रति व्‍यक्‍ित आय 13 हजार रुपये सालाना है, जो देश की प्रति व्‍यक्ति आय 41 हजार रुपये सालाना से बहुत पीछे है। बिजली की भारी किल्‍लत के कारण इस राज्‍य में कल-कारखाने पनप नहीं पा रहे हैं और उद्योग-धंधे के नाम पर किसी प्रकार का निवेश नहीं है. तो फिर कौन सा विकास और काहे का. सब हवा हवाई है.

बहुत दिन नहीं हुए उस बात को जब मात्र एक छोटी सी घटना पर नितीश जी इतने नाराज हुए की उन्होंने गुजरात सरकार की पांच करोड़ रूपए की सहायता वापिस कर डाली पर ऐसा करते हुए वे अपने समाजवादी गुरु किशन पटनायक को भूल गए जिनकी अगुवाई में उन्होंने उस समाजवाद की शिक्षा ली थी जो भारतीयता से ओतप्रोत थी. जिसमें भारत के हर कोने का नागरिक एक समान था और डॉक्टर लोहिया से लेकर जयप्रकाश नारायण रहे हों या फिर किशन पटनायक, सबका मानना था कि पूरे देश के नागरिक को देश के हर इलाके में आने-जाने और रहने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उनकी इस सोच का मतलब साफ था कि इससे भारतीय गणराज्य का नागरिक सही मायने में पूरे भारत को अपना मान सकेगा और क्षेत्रीयता की धारणा से उपर उठ सकेगा। पर गुजरात के नागरिकों के स्नेह से सना पैसा उन्होंने मात्र इसलिए लौटा दिया ताकि बिहार के १२% अल्पसंख्यक वोटों को अपनी ओर खींचा जा सके. और ऐसी ही कितनी कलाबाजियां उन्होंने दिखाई हैं.

नितीश जी को ये भी ध्यान से देखना होगा की २००५ का चुनाव उन्होंने अगर लालूराज के खिलाफ गोलबंद वोटों के दम पर जीता था तो उनके सहयोगी दल के साथ उनके दोयम व्यवहार के बावजूद उसी दल ने ११० में से करीब ९१-९२ सीटें जीत कर अपनी ताकत दिखा दी है. और इस बार भी जनता के उसी दर का इस्तेमाल किया फिर से नितीश जी ने ये कहते हुए की अगर कांग्रेस को वोट देंगे तो वह फिर से लालू को जाएगा क्योंकि वे UPA के घटक हैं और दिखावे की राजनीति कर रहे हैं. फिर अपना पुराना दांव सफलता पूर्वक चलकर नितीश जी ने छद्म करिश्मे की सूरत गढ़ते हुए अपने पुराने गुरुभाई लालू जी की तरह जनता को बेवक़ूफ़ बनाने की कला में माहिर हो गए हैं.


एक और चीज इस चुनाव में सामने दिखी. जनता से अपने काम की मजूरी मांगते नितीश कुमार के अधिकाँश सहयोगी या तो करोडपति हैं या बाहुबली. अब ये कौन बताये की आम बिहारी की गरीबी को ये कैसे दूर करेंगे जिनकी जिम्मेदार वे खुद ही हैं. .ध्यान देने योग्य बात यह भी है की इन चुनावों में राजग को मात्र ४१-४२ % जनता का वोट मिला है लेकिन इसी अल्पमत के बल पर उसने तीन चौथाई सीटें जीत ली हैं.यह शुरू से ही हमारे लोकतंत्र की बिडम्बना रही है कि देश में हमेशा अल्पमत क़ी सरकार बांटी रही है.देखना है कि सरकार जनता को किए गए वादों में से कितने को पूरा कर पाती है.प्रचार अभियान के दौरान राजग ने बिजली,रोजगार सृजन और भ्रष्टाचार सम्बन्धी नए कानून के क्रियान्वयन का वादा किया था.डगर आसान नहीं है.खासकर भ्रष्टाचार ने जिस तरह से शासन-प्रशासन के रग-रग में अपनी पैठ बना ली है.उससे ऐसा नहीं लगता कि नीतीश भ्रष्टाचारियों खासकर बड़ी मछलियों की संपत्ति पर आसानी से सरकारी कब्ज़ा कर उसमें स्कूल खोल पाएँगे जैसा कि उन्होंने अपने भाषणों में वादा किया था.पिछली बार से कहीं ज्यादा आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग राजग की तरफ से जीत कर विधानसभा में पहुंचे हैं.इन पर नियंत्रण रखना और इन पर मुकदमा चलाकर इन्हें सजा दिलवाना भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती रहेगी.अगले साल बिहार में पंचायत चुनाव होनेवाले हैं.राजग सरकार इसे दलीय आधार पर करवाना चाहती है.अगर ऐसा हुआ तो निश्चित रूप से इन चुनावों में भी राजग जीतेगा और सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाएगी.राज्य में पंचायत स्तर पर और जन वितरण प्रणाली में जो व्यापक भ्रष्टाचार है वह किसी से भी छुपा हुआ नहीं है.हालांकि गांवों में शिक्षामित्रों की बहाली कर दी गई है लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता में विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक में अभी भी गुणात्मक सुधार आना बांकी है.बिहार में १५ सालों के जंगल राज में उपजी हुई और भी बहुत-सी समस्याएं हैं जिनका समाधान नीतीश को अगले पांच सालों में ढूंढ निकालना है और इसी सत्य को अंगीकार करते हुए राज्य को समस्याविहीन राज्य बनाने की दिशा में अग्रसर करना होगा.इसलिए नितीश जी, आपको तो अपनी नीयत में बदलाव लाना ही होगा नहीं तो आपका हश्र भी फिर से आपके बड़े भाई जैसा ही होने वाला है. काठ की हांडी न तो देर तक चढ़ती है और ना दुबारा.

दरअसल बिहारियों के बारे में कहा जाता है कि वे कभी नाउम्मीद नहीं होते। आस की डोर थामे वे पूरी जिंदगी काट लेते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो लालू-राबड़ी पंद्रह सालों तक इस राज्‍य पर शासन नहीं कर पाते। लालू प्रसाद से बंधी उम्मीद की डोर टूटने में पंद्रह साल लगे थे। नीतीश कुमार को पांच साल ही मिले। उनसे इतनी जल्‍दी नाउम्मीद कैसे हुआ जा सकता है। विकास नहीं हुआ तो क्‍या हुआ, विकास की आस तो जगी है। लगातार पंद्रह सालों तक लालू-राबड़ी से मिली निराशा झेल चुके बिहार के लोग महज पांच सालों में नीतीश कुमार से निराश कैसे हो जाते। लिहाजा उन्होंने उनको और पांच साल देने का फैसला किया है।


इस सबसे अलग एक और नयी बात जिन्हें लालू और नितीश द्वय ने बिहार की राजनीति में अपने गुरुभाइयों के संग मिलकर एक नया ट्रेंड स्थापित कर दिया है. बिहार जातियों के खेमों से हटकर दो भागों में बट गया है. अगड़ा और पिछड़ा और ये तय हो गया है की ये खाई पटने वाली नहीं है. क्योंकि नितीश जी अपनी नीतियों की चोट से इसे और चौड़ा और गहरा कर रहे हैं. और इनकी इस चालबाजी ने बिहार की राजनीति में एक अति की जगह पर दूसरी अति को जन्म दे दिया है। अब पता नहीं बिहार में कब ऐसा अवसर आएगा जब मुख्य मंत्री पद का चुनाव करते समय जनता,राजनीतिक दल व विधायक दल अगड़ा-पिछड़ा का ध्यान नहीं रखते हुए किसी नेता की प्रतिभा,योग्यता,कार्य क्षमता,जनसेवा और ईमानदारी को आधार बनाएंगे।वैसे कुछ लोग यह भी कहते हैं कि थेसिस और एंटी थेसिस के बाद सिंथेसिस का समय एक दिन आएगा ही! तबतक के लिए हम तो कहेंगे.

" हमको मालूम है जन्नत की हकीक़त लेकिन
दिल को खुश रखने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है"